देहू में इंद्रायणी नदी के किनारे, अनाज के एक व्यापारी के बेटे ने एक दिन अपनी ही बहियों को पानी में डूबते देखा। उनमें उसने अभंग लिखे थे, यानी मराठी के भक्ति-गीत, उसी भाषा में जो आसपास के किसान और दुकानदार बोलते थे। एक विद्वान ने आपत्ति की थी कि एक ग़ैर-ब्राह्मण को शास्त्र समझाने का अधिकार नहीं, और तुकाराम से उनकी बहियाँ नदी में डुबवा दी गईं। वे देहू में एक पत्थर पर बैठ गए और 13 दिन तक उपवास और प्रार्थना में रहे। भक्त बताते हैं कि फिर बहियाँ बिना किसी नुक़सान के पानी से ऊपर आ गईं।
वह पत्थर आज भी पूजा जाता है, और वे गीत आज भी गाए जाते हैं। तुकाराम ने दिखाया कि अपनी भाषा में गाया गया ईश्वर का नाम अपने आप में पूरा मार्ग है। सच्चा संत वह है जो दुखी को अपना माने, यह कसौटी भी उन्हीं की है।
जीवन कथा
देहू का व्यापारी बेटा
तुकाराम का जन्म पुणे के पास इंद्रायणी नदी के किनारे बसे देहू गाँव में हुआ। ब्रिटैनिका उनका जन्म लगभग 1608 बताती है; 1568, 1577 और 1598 जैसे वर्ष भी सुझाए गए हैं। उनका परिवार कुनबी-मराठा समुदाय का था, अनाज का व्यापार और खेती करता था, और पीढ़ियों से विट्ठल का भक्त था। विट्ठल (विठोबा) पंढरपुर के देवता हैं।
किशोर उम्र में ही तुकाराम के माता-पिता चल बसे। घर और व्यापार की ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।
अकाल और बिछोह
लगभग 1629-30 में दक्कन में भयंकर अकाल पड़ा। इसी में तुकाराम की पहली पत्नी रखुमाबाई और एक बेटे की मृत्यु हो गई। व्यापार भी डूब गया। परंपरा याद रखती है कि अकाल के समय उन्होंने अनाज रोककर रखने के बजाय बाँट दिया।
इसके बाद उनका मन व्यापार से हट गया। 1630 के दशक में उन्होंने पहले के संतों की वाणी पढ़ी और देहू के पास भंडारा पहाड़ी पर लंबे समय तक ध्यान किया।
स्वप्न में गुरु
तुकाराम का कोई गुरु सामान्य अर्थ में नहीं था। भक्त बताते हैं कि स्वप्न में बाबाजी चैतन्य, जिन्हें राघव चैतन्य भी कहा जाता है, ने उन्हें दीक्षा दी और "राम कृष्ण हरि" का नाम-मंत्र दिया। एक और स्वप्न में संत नामदेव और विट्ठल प्रकट हुए और उनसे अभंग रचने को कहा।
वे कीर्तन करने लगे, यानी गाते हुए उपदेश देना। उनके अभंग सीधे-सादे थे, मराठी में थे, और आम लोगों में तेज़ी से फैल गए। वे ज्ञानेश्वर, नामदेव और एकनाथ की वारकरी परंपरा में खड़े हुए।
इंद्रायणी में बहियाँ
कट्टरपंथी विरोधियों ने कहा कि उन्हें शास्त्र की व्याख्या का अधिकार नहीं है, और उनसे उनकी बहियाँ इंद्रायणी में डुबवा दी गईं। तुकाराम ने जवाब में देहू में एक पत्थर पर बैठकर 13 दिन उपवास और प्रार्थना की। परंपरा कहती है कि बहियाँ सुरक्षित ऊपर आ गईं। यह प्रसंग आज किसी समुदाय पर दोष डाले बिना सुनाया जाता है।
ख्याति और प्रस्थान
1640 के दशक में उनकी ख्याति बढ़ी। उनके शिष्यों में बहिणाबाई थीं, जो स्वयं संत-कवयित्री बनीं। परंपरा उन्हें युवा छत्रपति शिवाजी से भी जोड़ती है, हालाँकि इतिहासकार इस पर एकमत नहीं हैं।
लगभग 1650 में देहू में उनका जीवन पूरा हुआ। यह कैसे हुआ, इस पर इतिहासकार एकमत नहीं। वारकरी मानते हैं कि वे सामान्य रूप से मरे ही नहीं, बल्कि सशरीर वैकुंठ, यानी विष्णु के धाम, चले गए। इसे वैकुंठगमन कहते हैं, और यह दिन फाल्गुन वद्य द्वितीया को तुकाराम बीज के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए उनकी कोई समाधि नहीं है।
उनके गीत तुकाराम गाथा में संकलित हुए, जिसमें लगभग 4,000 से 4,600 अभंग हैं। 1873 में छपे एक सरकारी संस्करण में 4,607 अभंग हैं। 14 जून 2022 को देहू में शिला मंदिर का लोकार्पण हुआ, जो उनकी 13 दिन की तपस्या वाले पत्थर के चारों ओर बना है।
मुख्य उपदेश
ईश्वर का नाम ही काफ़ी है
तुकाराम ने सिखाया कि प्रेम से विट्ठल का नाम लेना अपने आप में पूरा आध्यात्मिक मार्ग है। न महँगे कर्मकांड की ज़रूरत, न पुरोहित की, न किसी विद्वानों की भाषा की। जिस भाषा में आप घर में बोलते हैं, उसी में ईश्वर को गा सकते हैं। किसान, व्यापारी और मज़दूर इस नाम को खेत और बाज़ार में भी साथ ले जा सकते थे।
जहाँ दुखी की परवाह, वहीं ईश्वर
अपने सबसे प्रसिद्ध अभंगों में से एक में तुकाराम एक साँस में संत की परिभाषा देते हैं: "जे का रंजले गांजले । त्यासि म्हणे जो आपुले", यानी जो दुखी और सताए हुए लोगों को अपना कहे। "तोचि साधु ओळखावा । देव तेथेचि जाणावा", यानी उसी को सच्चा साधु जानो, और समझो कि ईश्वर वहीं है। उनके लिए पवित्रता का माप यही है कि आप दुख में पड़े इंसान के साथ कैसा बर्ताव करते हैं।
ईश्वर के सामने ऊँच-नीच नहीं
तुकाराम ने सिखाया कि ईश्वर जाति या हैसियत नहीं देखता, केवल भक्ति देखता है। उन्होंने यह स्वयं जिया, जब उनसे कहा गया कि उन्हें शास्त्र समझाने का अधिकार नहीं। उनकी सीख में विट्ठल के सामने भक्त का प्रेम मायने रखता है; जन्म किसी को निकट या दूर नहीं करता।
प्रकृति ही परिवार
तुकाराम ने भंडारा पहाड़ी और देहू के आसपास पेड़ों के बीच एकांत में ईश्वर को पाया। गाथा के अभंग 2376 में वे गाते हैं: "वृक्ष वल्ली आम्हा सोयरे वनचरे", यानी पेड़, बेलें और वन के जीव मेरे सगे हैं। उनके लिए प्रकृति परिवार थी, और उसमें बिताया शांत समय भक्ति को सहारा देता था।
ईमानदार जीवन, भक्ति के साथ
तुकाराम ने जीवन का बड़ा हिस्सा गृहस्थ और व्यापारी के रूप में बिताया। डॉ. सदानंद मोरे जैसे विद्वानों ने उनकी सीख को यूँ समझाया है कि सच्चाई और दया से जिया गया रोज़ का जीवन भी भक्ति हो सकता है। ईश्वर से प्रेम के लिए काम छोड़ना ज़रूरी नहीं; काम ईमानदारी से करें और होंठों पर नाम रखें।
रोज़ के जीवन के लिए
- रोज़ ईश्वर का नाम गाएँ या लें। अपनी भाषा में, अपनी आवाज़ में, सुबह चाहे दो मिनट ही सही।
- दुखी को परिवार मानें। इस सप्ताह कोई परेशान इंसान मिले, तो सोचें कि वह आपका भाई या बहन होता तो आप क्या करते।
- जाति, धन या हैसियत से न आँकें। मन में ऊँच-नीच की सोच उठे तो उसे किनारे रखें।
- पेड़ों के बीच शांत समय बिताएँ। फ़ोन के बिना किसी पेड़ के नीचे बैठें, जैसे तुकाराम भंडारा पहाड़ी पर ध्यान करते थे।
- ईमानदारी से कमाएँ, कठिन समय में बाँटें। याद रखें कि उन्होंने अकाल में अनाज बाँटा था; इस सप्ताह अपने भंडार से कुछ दें।
तीर्थ स्थान
- संत तुकाराम महाराज मंदिर, देहू, पुणे ज़िला, महाराष्ट्र। इंद्रायणी के किनारे उनके अपने गाँव का मंदिर।
- शिला मंदिर, देहू, महाराष्ट्र। उनकी 13 दिन की तपस्या का पत्थर यहाँ है; पंढरपुर की यात्रा से पहले वारकरी यहाँ सिर झुकाते हैं।
- भंडारा पहाड़ी, देहू के पास, महाराष्ट्र। जहाँ वे ध्यान करते थे और अभंग रचते थे।
- गाथा मंदिर, देहू, महाराष्ट्र। एक मंदिर जिसकी दीवारों पर उनके अभंग अंकित हैं।
- विट्ठल-रुक्मिणी मंदिर, पंढरपुर, सोलापुर ज़िला, महाराष्ट्र। आषाढ़ी वारी का गंतव्य; हर साल उनकी पालकी देहू से यहाँ के लिए निकलती है।
आज की विरासत
महाराष्ट्र में वारकरी आज भी तुकाराम के अभंग गाते हैं, और हर साल उनकी पालकी आषाढ़ी वारी के लिए देहू से पंढरपुर निकलती है। देहू के गाथा मंदिर की दीवारों पर उनके अभंग अंकित हैं।
उनकी शिष्या बहिणाबाई स्वयं एक संत-कवयित्री बनीं। परंपरा संताजी जगनाडे को उनके गीत सहेजने का श्रेय देती है। हर साल वारकरी उनके प्रस्थान की याद में तुकाराम बीज मनाते हैं। 2022 में उनकी तपस्या के पत्थर को अपना मंदिर, शिला मंदिर, मिला।
चित्र

यह चित्र जनरेटिव एआई से सुधारा, बड़ा किया या फिर से बनाया गया हो सकता है।
मार्ग पर चलें
तुकाराम ने कुछ बड़ा नहीं माँगा। इस सप्ताह रोज़ कुछ मिनट "राम कृष्ण हरि" गाएँ या बस बोलें, किसी शांत कोने में या चलते हुए। फिर किसी एक परेशान इंसान को ढूँढें और थोड़ी देर के लिए ही सही, उसे अपना परिवार मानकर बर्ताव करें। हो सके तो भोजन, अनाज या समय का कुछ दान करें। एक बार किसी पेड़ के नीचे बैठें और मौन को काफ़ी होने दें। कोई लक्ष्य नहीं पाना है। साधना बस नाम है, और दया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
संत तुकाराम कौन थे?
संत तुकाराम वारकरी परंपरा के मराठी संत-कवि थे, जिनका जन्म लगभग 1608 में पुणे के पास देहू में अनाज व्यापारी और किसान परिवार में हुआ। अकाल में पत्नी, बेटे और व्यापार को खोने के बाद वे पूरी तरह पंढरपुर के विट्ठल की भक्ति में लग गए। तुकाराम गाथा में संकलित उनके अभंग आज भी गाए जाते हैं।
संत तुकाराम का जन्म और देहांत कब हुआ?
उनका जन्म लगभग 1608 में हुआ, हालाँकि 1568, 1577 और 1598 जैसे वर्ष भी सुझाए गए हैं। देहू में उनका जीवन लगभग 1650 में पूरा हुआ; ब्रिटैनिका 1649 बताती है, जबकि ज़्यादातर वारकरी स्रोत 1650 मानते हैं। वारकरियों की आस्था है कि वे सामान्य मृत्यु के बजाय सशरीर वैकुंठ गए।
अभंग क्या होता है?
अभंग मराठी का भक्ति-गीत है, वह रूप जिसमें वारकरी संतों ने विट्ठल को गाया। तुकाराम ने लगभग 4,000 से 4,600 अभंग रचे, जो तुकाराम गाथा में संकलित हैं। ये कीर्तनों में गाए जाते हैं।
इंद्रायणी नदी में तुकाराम की गाथा के साथ क्या हुआ?
कट्टरपंथी विरोधियों ने कहा कि तुकाराम को शास्त्र की व्याख्या का अधिकार नहीं, और उनसे अभंगों की बहियाँ देहू में इंद्रायणी में डुबवा दी गईं। वे 13 दिन एक पत्थर पर उपवास और प्रार्थना में बैठे रहे। परंपरा मानती है कि फिर बहियाँ सुरक्षित ऊपर आ गईं। वह पत्थर अब शिला मंदिर में है।
तुकाराम बीज क्या है?
तुकाराम बीज वह दिन है जब वारकरी तुकाराम के वैकुंठ प्रस्थान को याद करते हैं, जो उनकी आस्था के अनुसार सशरीर हुआ। यह फाल्गुन वद्य द्वितीया को पड़ता है, यानी फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष का दूसरा दिन।
स्रोत
- Tukaram — Encyclopaedia Britannica
- PM in Pune: About the Shila Mandir at Dehu — Press Information Bureau
- PM's address at the inauguration of the Sant Tukaram Maharaj temple, Dehu — PMIndia
- Tukaram — New World Encyclopedia
- जे का रंजले गांजले — Dr Sadanand More
- Abhang 204 and 2376, Sartha Gatha — Warkari Rojnishi
गुरुशक्ति द्वारा शोध और लेखन, अक्टूबर 2026।
