बारदी के आश्रम में भोजन सिर्फ़ इंसानों के लिए नहीं होता था। भक्त बताते हैं कि बाबा लोकनाथ बांग्ला में पुकारते, "आय, आय", यानी "आओ, आओ", और पक्षी, कीड़े-मकोड़े और पशु खाने के लिए जुट जाते। वे हर हिस्सा बराबर बाँटते, शिष्यों को भी और इन जीवों को भी। उनकी सीख थी कि ईश्वर सब प्राणियों में बसता है।
बाबा लोकनाथ ब्रह्मचारी ने अपने अंतिम बरस सोनारगाँव के इसी गाँव में बिताए, जो आज बांग्लादेश में है। उन्होंने कोई किताब नहीं लिखी। फिर भी बारदी का आश्रम और पश्चिम बंगाल के उनके मंदिर आज भी तीर्थयात्रियों को बुलाते हैं, और मुसीबत में भक्त आज भी उनके वचन दोहराते हैं। उनका रास्ता सीधा है: गुस्से पर काबू, हर जीव की सेवा, और कठिन समय में ईश्वर का स्मरण।
जीवन कथा
ईश्वर को सौंपा गया बालक
परंपरा के अनुसार उनका जन्म 1730 में जन्माष्टमी के दिन हुआ। उनके जीवनीकार डॉ. असीमबरण दे बांग्ला पंचांग के अनुसार तारीख़ 18 भाद्र 1137 बताते हैं, जो 29 अगस्त 1730 बनती है। आज के उत्तर 24 परगना, पश्चिम बंगाल के दो गाँव, चाकला और कचुआ, उनका जन्मस्थान होने का दावा करते हैं।
उनकी माता कमला देवी थीं। पिता के नाम पर स्रोत एकमत नहीं: कोई रामनारायण घोषाल लिखता है, कोई रामकानाई घोषाल। लोकनाथ डिवाइन लाइफ़ मिशन के अनुसार वे चौथी संतान थे। डॉ. दे लिखते हैं कि धर्मपरायण ब्राह्मण माता-पिता चाहते थे कि उनका एक बेटा संन्यासी बने।
कचुआ के संस्कृत विद्वान आचार्य भगवान गांगुली ने बालक का नाम लोकनाथ रखा। मिशन इसका अर्थ "लोकों के स्वामी" बताता है।
ग्यारह बरस में घर छोड़ना
ग्यारह बरस की उम्र में भगवान गांगुली ने लोकनाथ का उपनयन, यानी जनेऊ संस्कार किया। इसके बाद वे ब्रह्मचारी बनकर घर से निकल पड़े। मित्र बेणीमाधव का भी उनके साथ ही उपनयन हुआ था, और वे भी साथ चले।
गुरु पहले दोनों को कोलकाता में कालीघाट के आसपास के जंगलों में ले गए। डॉ. दे लिखते हैं कि बाद में वे गंगा के पश्चिम के जंगलों में साधना करते रहे।
बरसों की साधना
मिशन के अनुसार लोकनाथ ने गुरु के साथ तीस से ज़्यादा बरस अष्टांग और हठ योग की साधना की। उन्होंने ब्रह्मचर्य का व्रत निभाया और उपवास किए। परंपरा उनके आत्मज्ञान को हिमालय से जोड़ती है। मिशन लिखता है कि लगभग नब्बे बरस की उम्र में उन्हें निर्विकल्प समाधि मिली, यानी ध्यान की सबसे गहरी अवस्था।
भक्तों का विश्वास है कि बाद में वे मक्का, अफ़ग़ानिस्तान और फ़ारस तक गए, जैसा मिशन बताता है। यह परंपरा है, दर्ज इतिहास नहीं।
चंद्रनाथ पहाड़ से बारदी तक
बसने से पहले परंपरा उन्हें आज के बांग्लादेश के चंद्रनाथ पहाड़ पर बताती है। डॉ. दे के अनुसार वहीं उनकी भेंट बंगाल के संत विजयकृष्ण गोस्वामी से हुई, जिन्हें भक्त उनके कृपापात्रों में गिनते हैं।
बांग्ला संवत 1270 के आसपास, यानी लगभग 1863 में, वे नारायणगंज इलाक़े में सोनारगाँव के गाँव बारदी आए। उन्हें लाने वाले थे वहीं के डेंगू कर्मकार। भक्त बताते हैं कि डेंगू पर एक झूठा आपराधिक मुक़दमा था, और योगी का आशीर्वाद पाने के बाद वे बरी हो गए।
डेंगू का परिवार एक निर्वस्त्र तपस्वी को घर में रखने से हिचकिचाया। तब नाग बाबू नाम के एक स्थानीय ज़मींदार ने श्मशान के पास की बंजर ज़मीन दे दी। वहाँ फूस की एक सादी कुटिया बनी, और यही आश्रम बन गया।
बारदी के छब्बीस बरस
बाबा लोकनाथ लगभग छब्बीस बरस बारदी में रहे। एक विधवा ग्वालिन, ग्वालिनी माँ, आश्रम की देखभाल करती थीं।
भक्त बताते हैं कि एक बार वे नारायणगंज की अदालत में गवाह बनकर गए और अपनी उम्र डेढ़ सौ बरस से ज़्यादा बताई। भक्त मानते हैं कि वे 160 बरस जिए। ये आँकड़े परंपरा का हिस्सा हैं।
अंतिम दिन
बांग्ला पंचांग की 19 ज्येष्ठ 1297 को, जिसे मिशन 2 जून 1890 बताता है, बाबा लोकनाथ ने बारदी आश्रम में देह त्यागी। डॉ. दे लिखते हैं कि वे गोमुखासन में बैठे थे और दोपहर से कुछ पहले ध्यान में ही चले गए। मिशन के अनुसार उनकी आँखें खुली रहीं और देह बैठी ही रही।
उन्होंने पहले ही बता दिया था कि उनकी देह का दाह-संस्कार हो। आश्रम में चंदन की चिता बनी और रामकुमार चक्रवर्ती ने अंतिम संस्कार किया। उनकी समाधि आज भी बारदी में है।
मुख्य उपदेश
हर जीव में ईश्वर
बाबा लोकनाथ की सबसे जानी-मानी आदत थी पशुओं, पक्षियों और कीड़ों को उसी प्रेम से खिलाना जिससे वे इंसानों को खिलाते थे। डॉ. दे लिखते हैं कि वे इन्हें पुकारकर बुलाते और बराबर भोजन बाँटते। कारण सीधा था: ईश्वर सब प्राणियों में बसता है। भक्त इससे यह सीखते हैं कि भूखा पक्षी और भूखा इंसान, दोनों एक जैसी देखभाल के हक़दार हैं।
संकट में याद करना
भक्तों को उनका यह आश्वासन बहुत प्रिय है, जिसे डॉ. दे ने दर्ज किया: "रण में, वन में, जल में, जंगल में, जहाँ भी विपदा में पड़ो, मुझे याद करना।" लोकनाथ डिवाइन लाइफ़ मिशन भी इसका मिलता-जुलता अंग्रेज़ी रूप देता है। भक्त इसे इस तरह समझते हैं कि जब डर उठे, तो मन को ईश्वर की ओर मोड़ो। गुरुशक्ति इसे आस्था और धीरज की सीख के रूप में रखता है, किसी फल के वादे के रूप में नहीं।
क्रोध नाम का शत्रु
डॉ. दे उनकी सीधी चेतावनी दर्ज करते हैं: "क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।" अहंकार के बारे में वे कहते थे कि जब तक "मैं" हावी है, इंसान बँधा रहता है।
गृहस्थी एक क़िला
बाबा लोकनाथ जीवन भर ब्रह्मचारी रहे, पर उन्होंने आने वालों से घर छोड़ने को नहीं कहा। डॉ. दे उनकी यह उपमा दर्ज करते हैं: "गृहस्थ आश्रम एक क़िला है।" अगर भीतर की लड़ाई लड़नी ही है, तो क़िले के अंदर से लड़ना बेहतर है। परिवार का जीवन साधना की रक्षा भी करता है।
सबके लिए बिखरी कृपा
डॉ. दे उनका एक और वचन दर्ज करते हैं: "मेरी दया बिखरी पड़ी है, बस बटोर लेनी है।" कृपा पहले से मौजूद है; साधक को बस मन खुला रखना है। मिशन लिखता है कि उन्होंने देह के बाद भी सूक्ष्म रूप में रहने की बात कही थी।
रोज़ के जीवन के लिए
- किसी एक जीव को खिलाइए। इस हफ़्ते एक बार पक्षियों या किसी बेसहारा पशु के लिए दाना या पानी रखिए, उसी प्रेम से जैसे किसी मेहमान को परोसते हैं।
- गुस्सा गुज़रने दीजिए, फिर बोलिए। गुस्सा उठे तो कुछ साँसें रुकिए। मन शांत होने के बाद ही बोलिए।
- घर में ही साधना कीजिए। घर के कामों को आध्यात्मिक जीवन का हिस्सा मानिए। इस हफ़्ते रोज़ एक काम पूरे ध्यान से कीजिए।
- मुसीबत में शांति से याद कीजिए। कुछ गड़बड़ हो, तो कुछ करने से पहले एक पल रुककर मन को ईश्वर की ओर ले जाइए।
- एक छोटा नियम रखिए। संयमित भोजन या दस मिनट शांत बैठना, ऐसी कोई एक आदत चुनिए और इस हफ़्ते रोज़ निभाइए।
- पहले से मौजूद कृपा को पहचानिए। हर शाम दिन भर में मिली किसी एक भलाई को याद कीजिए और उसके लिए धन्यवाद दीजिए।
तीर्थ स्थान
- श्री श्री लोकनाथ ब्रह्मचारी आश्रम, बारदी, सोनारगाँव, नारायणगंज, बांग्लादेश। उनका आश्रम और समाधि, ढाका से लगभग 35 किलोमीटर। परिसर में एक तालाब और दुर्गा मंडप है।
- चाकला धाम, देगंगा ब्लॉक, उत्तर 24 परगना, पश्चिम बंगाल। उनके दो दावेदार जन्मस्थानों में से एक पर बाबा लोकनाथ का प्रसिद्ध मंदिर।
- कचुआ धाम, बसीरहाट II, उत्तर 24 परगना, पश्चिम बंगाल। दूसरा दावेदार जन्मस्थान, जहाँ उनके जन्मोत्सव पर भारी भीड़ जुटती है।
- कालीघाट, कोलकाता, पश्चिम बंगाल। परंपरा के अनुसार वह जगह जहाँ उन्होंने और बेणीमाधव ने गुरु के साथ साधना शुरू की।
आज की विरासत
बारदी का आश्रम उनकी समाधि सँभालता है और तीर्थयात्रियों को सोनारगाँव तक बुलाता है। पश्चिम बंगाल में चाकला और कचुआ के मंदिरों में भारी भीड़ जुटती है, ख़ासकर उनके जन्मदिन पर, जिसे भक्त जन्माष्टमी को मनाते हैं।
कोलकाता में केंद्र वाला लोकनाथ डिवाइन लाइफ़ मिशन आज उनके नाम पर सिखाता है और उसने उनकी एक जीवनी, द इनक्रेडिबल लाइफ़ ऑफ़ अ हिमालयन योगी (2014), प्रकाशित की है। डॉ. असीमबरण दे की अजाना महायोगी बाबा लोकनाथ जैसी बांग्ला जीवनियाँ उनके वचन और बारदी की कहानियाँ सहेजती हैं।
मार्ग पर चलें
बाबा लोकनाथ की साधना सरल थी, और वह आपके अपने दरवाज़े से शुरू हो सकती है। इस हफ़्ते रोज़ सुबह पक्षियों के लिए थोड़ा दाना या पानी रखिए, जैसे वे बारदी में करते थे। हो सके तो किसी ज़रूरतमंद को एक समय का भोजन देकर दान कीजिए।
गुस्सा उठे तो बोलने से पहले कुछ साँसें रुकिए। चिंता घेरे तो एक पल शांत बैठकर ईश्वर को याद कीजिए, उनके नाम से या किसी भी नाम से जो आपको प्रिय हो। दया के छोटे, नियमित काम ही उनके रास्ते का दिल थे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या बाबा लोकनाथ सचमुच 160 बरस जिए?
भक्त मानते हैं कि उनका जन्म 1730 में और देहांत 1890 में हुआ, यानी लगभग 160 बरस। यह परंपरा है, प्रमाणित इतिहास नहीं। उनके जन्म की तारीख़ भी विवादित है। बारदी में 1890 में उनका देहांत सबसे पक्की तारीख़ है।
बाबा लोकनाथ का आश्रम और समाधि कहाँ है?
उनका आश्रम और समाधि बांग्लादेश के नारायणगंज ज़िले में सोनारगाँव के बारदी गाँव में है, ढाका से लगभग 35 किलोमीटर। वे यहाँ लगभग छब्बीस बरस रहे और 1890 में यहीं देह त्यागी।
बाबा लोकनाथ का जन्म कहाँ हुआ था?
पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना ज़िले के दो गाँव, चाकला और कचुआ, उनका जन्मस्थान होने का दावा करते हैं। परंपरा उनका जन्म 1730 में जन्माष्टमी के दिन मानती है।
बाबा लोकनाथ के गुरु कौन थे?
उनके गुरु कचुआ के आचार्य भगवान गांगुली थे, जो संस्कृत के विद्वान थे। उन्होंने ग्यारह बरस की उम्र में लोकनाथ का जनेऊ संस्कार किया और उन्हें तथा उनके मित्र बेणीमाधव को बरसों की योग साधना में ले गए।
"संकट में मुझे याद करना" का क्या अर्थ है?
डॉ. असीमबरण दे उनके वचन दर्ज करते हैं: रण में, वन में, जल में, जंगल में, जहाँ भी विपदा में पड़ो, मुझे याद करना। भक्त इसे डर उठने पर मन को ईश्वर की ओर मोड़ने का बुलावा मानते हैं। यह आस्था और धीरज की साधना है, यह वादा नहीं कि मुश्किलें कभी आएँगी ही नहीं।
स्रोत
- About Baba Lokenath – Lokenath Divine Life Mission
- Ajana Mahayogi Baba Loknath (Bengali), Dr Asimbaran De – contents
- Ajana Mahayogi Baba Loknath: Baradi chapter
- Ajana Mahayogi Baba Loknath: sayings chapter
- Tourism – North 24 Parganas District, Government of West Bengal
- Baradi Loknath Babar Ashram – Smithsonian Magazine Photo Contest
गुरुशक्ति द्वारा शोध और लेखन, अक्टूबर 2026।
