17 सितंबर 1965 को जलदूत नाम का एक मालवाहक जहाज़ अमेरिका के बोस्टन बंदरगाह पर कॉमनवेल्थ पियर पर आकर लगा। उस पर चालक दल के अलावा केवल एक यात्री था: वृंदावन का एक 69 वर्षीय संन्यासी। कलकत्ता से 35 दिन की इस समुद्री यात्रा में उन्हें दो बार दिल का दौरा पड़ चुका था। उनके पास बस कुछ डॉलर के बराबर रुपये थे, और संस्कृत ग्रंथों के अपने अनुवादों से भरा एक बक्सा। दो दिन बाद जहाज़ न्यूयॉर्क पहुँचा।
वह संन्यासी थे ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी, जिन्हें उनके अनुयायी श्रील प्रभुपाद कहते हैं। एक साल के भीतर न्यूयॉर्क में उनका एक छोटा-सा मंदिर खुल गया था, और एक सार्वजनिक पार्क में लोग कृष्ण का नाम गा रहे थे। उन्होंने इंटरनेशनल सोसाइटी फ़ॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (इस्कॉन), यानी हरे कृष्ण आंदोलन की स्थापना की। उनका जीवन सिखाता है कि भगवान का नाम लेने के लिए किसी विशेष योग्यता की ज़रूरत नहीं, और अच्छा काम शुरू करने में कभी देर नहीं होती।
जीवन कथा
कलकत्ता का बालक अभय
अभय चरण दे का जन्म 1 सितंबर 1896 को कलकत्ता में हुआ। पिता गौर मोहन दे कपड़े के व्यापारी थे और माता का नाम रजनी था। परिवार गौड़ीय वैष्णव परंपरा को मानता था।
1916 से उन्होंने कलकत्ता के स्कॉटिश चर्चेज़ कॉलेज में अंग्रेज़ी, दर्शनशास्त्र और अर्थशास्त्र पढ़ा। गांधीजी के स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थन में डिग्री लेने से मना कर दिया। विवाह के बाद वे एक दवा कंपनी में मैनेजर बने।
1922 का आदेश
1922 में कलकत्ता में उनकी भेंट श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती से हुई, जो गौड़ीय वैष्णव परंपरा के एक प्रमुख आचार्य थे। पहली ही भेंट में उन्होंने युवक अभय से पूछा कि तुम श्री चैतन्य का संदेश अंग्रेज़ी में पूरी दुनिया तक क्यों नहीं पहुँचाते। बाद में अभय ने उनसे विधिवत दीक्षा ली, और बाकी जीवन इसी एक आदेश को पूरा करने में लगा दिया।
शुरू में यह काम गृहस्थी के साथ-साथ चला। 1944 में उन्होंने अकेले दम पर बैक टु गॉडहेड नाम की अंग्रेज़ी पत्रिका शुरू की। 1947 में गौड़ीय वैष्णव सोसाइटी ने उन्हें "भक्तिवेदांत" की उपाधि दी।
वृंदावन और संन्यास
1950 में उन्होंने गृहस्थ जीवन छोड़ दिया। 1954 में उन्होंने वानप्रस्थ लिया। वे वृंदावन के राधा-दामोदर मंदिर में रहने लगे, जहाँ उन्हें दो कमरे मिले। यहीं वे श्रीमद्भागवतम् और बैक टु गॉडहेड पर काम करते थे।
17 सितंबर 1959 को मथुरा के श्री केशवजी गौड़ीय मठ में उन्होंने संन्यास लिया। संन्यास उनके गुरुभाई श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी ने दिया, और वे भक्तिवेदांत स्वामी कहलाए। 1962 में उनके अंग्रेज़ी श्रीमद्भागवतम् का पहला खंड छपा।
समुद्र पार न्यूयॉर्क तक
13 अगस्त 1965 को वे जलदूत जहाज़ से कलकत्ता से रवाना हुए। 17 सितंबर को बोस्टन और 19 सितंबर को न्यूयॉर्क पहुँचे। जुलाई 1966 में उन्होंने न्यूयॉर्क में इस्कॉन का पंजीकरण कराया। 26 सेकंड एवेन्यू की एक छोटी दुकान में पहला मंदिर बना।
9 अक्टूबर 1966 को वे टॉम्पकिन्स स्क्वेयर पार्क में एक अमेरिकी एल्म पेड़ के नीचे बैठे और खुले आसमान के नीचे हरे कृष्ण कीर्तन कराया। भारत के बाहर इस तरह खुले में महामंत्र का यह पहला कीर्तन था। कवि एलेन गिंसबर्ग भी इसमें शामिल हुए।
ग्यारह वर्ष, पूरी दुनिया
अगले वर्षों में उन्होंने छह महाद्वीपों की यात्रा की। सौ से अधिक मंदिर खोले, साथ में विद्यालय और समुदाय भी। भगवद्गीता यथारूप (पूर्ण संस्करण 1972), श्रीमद्भागवतम् के अनेक खंड और श्री चैतन्य-चरितामृत (1974–75) इन्हीं वर्षों में छपे। कुल मिलाकर उन्होंने अनुवाद और टीका के साठ से अधिक खंड छोड़े, और लगभग 5,000 शिष्यों को दीक्षा दी।
यह काम वे भारत भी लेकर आए। 1975 में राम नवमी के दिन उन्होंने वृंदावन के रमण रेती में श्री श्री कृष्ण बलराम मंदिर खोला। पश्चिम बंगाल के मायापुर में श्री मायापुर चंद्रोदय मंदिर इस्कॉन का विश्व मुख्यालय है। 14 नवंबर 1977 को, 81 वर्ष की आयु में, वृंदावन में उनका देहावसान हुआ। उनकी समाधि कृष्ण बलराम मंदिर में है।
मुख्य उपदेश
हरि नाम
उनकी शिक्षा के केंद्र में हरे कृष्ण महामंत्र है। भगवद्गीता यथारूप की भूमिका में वे इसे पूरा देते हैं। प्राक्कथन और भूमिका में वे समझाते हैं कि कृष्ण और उनका नाम अलग नहीं हैं। इसलिए नाम जपना कृष्ण के साथ होना है। माला पर जप करें, कीर्तन (सामूहिक भजन) में गाएँ, या काम करते हुए मन में नाम लें।
आत्मा सदा सेवक है
भगवद्गीता यथारूप के प्राक्कथन में वे लिखते हैं कि हर किसी को जानना चाहिए कि जीव सदा से सेवक है। उनका कहना था कि आत्मा का स्वाभाविक स्थान कृष्ण की सेवा है। जो कृष्ण की सेवा नहीं करता, वह माया की सेवा करता है। चुनाव केवल इतना है कि सेवा किसकी करें।
गीता जैसी है वैसी
उन्होंने अपने अनुवाद का नाम भगवद्गीता यथारूप यानी "गीता जैसी है वैसी" यूँ ही नहीं रखा। प्राक्कथन में वे लिखते हैं कि उन्होंने गीता को बिना किसी मिलावट के, जैसी है वैसी ही प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। वे चाहते थे कि पाठक इसे कृष्ण के अपने शब्द मानकर, भक्ति भाव से पढ़ें, और स्वयं को कृष्ण के बराबर न समझें।
काम भी कृष्ण के लिए
प्रभुपाद ने लोगों से अपने कर्तव्य छोड़ने को नहीं कहा। गीता की भूमिका में वे अर्जुन से कहे गए कृष्ण के शब्दों की ओर ध्यान दिलाते हैं: मुझे याद करते रहो, और साथ ही अपना नियत कर्तव्य करते रहो। प्राक्कथन में वे समझाते हैं कि अपनी इंद्रियों की नहीं, भगवान की प्रसन्नता के लिए काम करना ही जीवन की सबसे ऊँची पूर्णता है।
जो मिला, उसे बाँटो
उनका अपना जीवन उनकी सबसे साफ़ शिक्षा है। 1922 में गुरु के एक वाक्य ने अगले 55 वर्षों का उनका सारा काम तय कर दिया। उन्होंने लिखा, अनुवाद किया और छापा, ताकि दूसरे लोग भक्ति के ग्रंथ अंग्रेज़ी में पढ़ सकें। विदेश में अपना मिशन उन्होंने 69 वर्ष की आयु में शुरू किया।
रोज़ के जीवन के लिए
- रोज़ नाम जपें। इस हफ़्ते सुबह या शाम का एक समय तय करें और हरे कृष्ण महामंत्र का जप करें, माला पर या ऊँचे स्वर में।
- थोड़ी गीता पढ़ें। रोज़ कुछ श्लोक धीरे-धीरे पढ़ें, बहस के लिए नहीं, भक्ति भाव से।
- काम अर्पित करें। कोई भी काम शुरू करने से पहले मन ही मन उसे कृष्ण को अर्पित करें, और पूरे मन से करें।
- देर कभी नहीं होती। उन्होंने अपना मुख्य काम 69 वर्ष की आयु में शुरू किया। टाला हुआ कोई अच्छा काम इस हफ़्ते शुरू करें।
- जो प्रिय है, उसे बाँटें। किसी को एक किताब, एक समय का भोजन या अपना एक घंटा दें। यह छोटा-सा दान है।
तीर्थ स्थान
- श्री श्री कृष्ण बलराम मंदिर, रमण रेती, वृंदावन, उत्तर प्रदेश। 1975 में उनका खोला मंदिर, जहाँ उनकी समाधि और उनका निवास है।
- राधा-दामोदर मंदिर, वृंदावन, उत्तर प्रदेश। अमेरिका जाने से पहले वे यहीं रहे और लिखते रहे।
- श्री मायापुर चंद्रोदय मंदिर, मायापुर, पश्चिम बंगाल। इस्कॉन का विश्व मुख्यालय, जहाँ उनका पुष्प समाधि मंदिर और भजन कुटीर है।
- श्री केशवजी गौड़ीय मठ, मथुरा, उत्तर प्रदेश। यहाँ उन्होंने 1959 में संन्यास लिया।
- टॉम्पकिन्स स्क्वेयर पार्क और 26 सेकंड एवेन्यू, न्यूयॉर्क, अमेरिका। हरे कृष्ण ट्री और उनके पहले छोटे मंदिर का स्थान।
आज की विरासत
1966 में न्यूयॉर्क की एक छोटी दुकान से शुरू हुआ आंदोलन उनके जीवनकाल में ही सौ से अधिक मंदिरों तक पहुँच गया। वृंदावन में उनकी समाधि है और मायापुर में पुष्प समाधि मंदिर। उनके ग्रंथ आज भी छपते और पढ़े जाते हैं, और इस्कॉन ने गीता तथा अन्य ग्रंथों का अनेक भाषाओं में अनुवाद किया है। 1944 में उनकी अकेले शुरू की गई पत्रिका बैक टु गॉडहेड आज भी छपती है। 1 सितंबर 2021 को उनकी 125वीं जयंती पर भारत में एक विशेष स्मारक सिक्का जारी किया गया।
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मार्ग पर चलें
श्रील प्रभुपाद ने कुछ कठिन नहीं माँगा। इस हफ़्ते रोज़ दस मिनट का शांत समय निकालें। आराम से बैठें और हरे कृष्ण महामंत्र धीरे-धीरे जपें, हर शब्द को ध्यान से सुनते हुए। सेवा के भाव से किसी को एक सादा भोजन भी करा सकते हैं। जहाँ हैं, जिस उम्र में हैं, वहीं से शुरू करें। यही उनका दिखाया रास्ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्रील प्रभुपाद के गुरु कौन थे?
उनके गुरु गौड़ीय वैष्णव आचार्य श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी थे। दोनों की पहली भेंट 1922 में कलकत्ता में हुई, जब गुरु ने उनसे श्री चैतन्य का संदेश अंग्रेज़ी में फैलाने को कहा। 1959 में मथुरा में उन्होंने अपने गुरुभाई श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी से संन्यास लिया।
श्रील प्रभुपाद अमेरिका कब और कैसे गए?
वे 13 अगस्त 1965 को 69 वर्ष की आयु में मालवाहक जहाज़ जलदूत से कलकत्ता से रवाना हुए। 35 दिन की यात्रा में उन्हें दो बार दिल का दौरा पड़ा। जहाज़ 17 सितंबर 1965 को बोस्टन और दो दिन बाद, 19 सितंबर को, न्यूयॉर्क पहुँचा।
हरे कृष्ण महामंत्र क्या है?
महामंत्र है: "हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।" श्रील प्रभुपाद भगवद्गीता यथारूप की भूमिका में इसे देते हैं, और सिखाते थे कि कृष्ण का नाम कृष्ण से अलग नहीं है।
भगवद्गीता यथारूप क्या है?
यह श्रील प्रभुपाद का भगवद्गीता का अंग्रेज़ी अनुवाद है, जिसमें संस्कृत मूल और उनकी टीका दोनों हैं। इसका संक्षिप्त संस्करण 1968 में और पूर्ण संस्करण 1972 में आया। प्राक्कथन में वे बताते हैं कि उन्होंने गीता को अपने विचार जोड़े बिना, जैसी है वैसी प्रस्तुत करने का प्रयास किया।
श्रील प्रभुपाद की समाधि कहाँ है?
श्रील प्रभुपाद का देहावसान 14 नवंबर 1977 को 81 वर्ष की आयु में वृंदावन में हुआ। उनका समाधि मंदिर वृंदावन के रमण रेती में श्री श्री कृष्ण बलराम मंदिर में है, जिसे उन्होंने 1975 में खोला था। मायापुर में भी उनकी स्मृति में पुष्प समाधि मंदिर है।
स्रोत
गुरुशक्ति द्वारा शोध और लेखन, अक्टूबर 2026।
