सितंबर 1920 में एक युवा भारतीय संन्यासी अमेरिका के बोस्टन शहर पहुँचे। उनकी उम्र 27 साल थी और वे धार्मिक उदारवादियों की अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस में भारत के प्रतिनिधि बनकर आए थे। उनके भाषण का विषय था "धर्म का विज्ञान"। पर उनके मन में एक बड़ा काम और था: अपनी गुरु-परंपरा का क्रिया योग उन लोगों तक पहुँचाना, जिन्होंने इसका नाम तक नहीं सुना था। भक्तों के अनुसार, निकलने से पहले महावतार बाबाजी ने उनसे कहा था कि इसी काम के लिए उन्हें चुना गया है।
यह संन्यासी थे स्वामी योगानन्द, जिन्हें आगे चलकर परमहंस योगानन्द कहा गया। उनका बाद का जीवन ज़्यादातर अमेरिका में बीता, पर उनका पहला विद्यालय और आश्रम राँची में था, और भारत में उनकी बनाई संस्था आज भी उनकी साधना सिखाती है। आज के साधक के लिए उनकी बात सीधी और व्यावहारिक है: रोज़ ध्यान में बैठिए, शरीर और मन का ध्यान रखिए, और हर सच्चे धर्म के नीचे छिपे एक ही सत्य को पहचानिए।
जीवन कथा
गोरखपुर का बालक
मुकुंद लाल घोष का जन्म 5 जनवरी 1893 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक धर्मपरायण बंगाली परिवार में हुआ। उनके माता-पिता योगी लाहिड़ी महाशय के शिष्य थे। जब मुकुंद शिशु थे, लाहिड़ी महाशय ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि यह बालक योगी बनेगा। योगी कथामृत में योगानन्द ने उनके शब्द दर्ज किए हैं कि यह बालक "बहुत-सी आत्माओं को ईश्वर के राज्य तक ले जाएगा।" आगे जिस गुरु को मुकुंद ने पाया, वे भी लाहिड़ी महाशय के ही शिष्य थे।
श्री युक्तेश्वर के साथ दस वर्ष
1910 में, 17 साल की उम्र में, मुकुंद अपने गुरु स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि से मिले। लगभग दस साल उन्होंने गुरु के आश्रम में साधना और शिक्षा पाई। 1915 में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उसी साल उन्होंने स्वामी परंपरा की गिरि शाखा में संन्यास लिया और उन्हें योगानन्द नाम मिला।
1917 में उन्होंने लड़कों के लिए एक विद्यालय शुरू किया, जहाँ सामान्य पढ़ाई के साथ योग और ध्यान भी सिखाया जाता था। यह विद्यालय जल्द ही राँची में स्थापित हो गया, जहाँ वे एक लीची के पेड़ के नीचे पढ़ाते थे। वह पेड़ और आश्रम में उनका कमरा आज भी सँजोकर रखे गए हैं। उसी साल उन्होंने योगदा सत्संग सोसायटी ऑफ़ इंडिया (YSS) की स्थापना की।
क्रिया योग पश्चिम की ओर
सितंबर 1920 में वे बोस्टन पहुँचे और "धर्म का विज्ञान" पर बोले। उसी साल उन्होंने पश्चिम के लिए सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप (SRF) शुरू की। 1924 और 1925 में उन्होंने पूरे अमेरिका में भरे हुए सभागारों में प्रवचन दिए। 1925 में लॉस एंजेलिस के माउंट वॉशिंगटन पर मुख्यालय बना, जो SRF का मदर सेंटर कहलाया।
भारत वापसी, 1935–36
1935 में, जिस साल अमेरिका में SRF को कानूनी मान्यता मिली, योगानन्द भारत लौटे। वर्धा में वे महात्मा गांधी से मिले, जिन्होंने उनसे क्रिया योग की दीक्षा माँगी। इसी यात्रा में वे श्री रमण महर्षि और श्री आनंदमयी माँ से भी मिले। श्री युक्तेश्वर ने उन्हें "परमहंस" की उपाधि दी। 9 मार्च 1936 को श्री युक्तेश्वर ने देह त्याग दी।
पुस्तक और अंतिम वर्ष
1946 में ऑटोबायोग्राफ़ी ऑफ़ अ योगी प्रकाशित हुई, जो हिंदी में योगी कथामृत के नाम से मिलती है। इसका बड़ा हिस्सा कैलिफ़ोर्निया के एनसिनिटास स्थित SRF हर्मिटेज में लिखा गया। 1950 में उन्होंने पैसिफ़िक पैलिसेड्स में SRF लेक श्राइन का लोकार्पण किया, जहाँ गांधीजी की अस्थियों का एक अंश रखा है।
7 मार्च 1952 को लॉस एंजेलिस के बिल्टमोर होटल में भारत के राजदूत डॉ. बिनय आर. सेन के सम्मान में भोज था। वहाँ भाषण देने के ठीक बाद योगानन्द ने महासमाधि ली, यानी एक योगी का सचेत होकर देह छोड़ना। उनका पार्थिव शरीर ग्लेनडेल के फ़ॉरेस्ट लॉन मेमोरियल-पार्क में रखा गया। वहाँ के निदेशक ने बाद में गवाही दी कि मृत्यु के 20 दिन बाद भी शरीर में कोई क्षय नहीं दिखा।
मुख्य उपदेश
क्रिया योग
उनके उपदेश के केंद्र में क्रिया योग है, ध्यान की वह प्राचीन विधि जो महावतार बाबाजी से लाहिड़ी महाशय और श्री युक्तेश्वर होते हुए उन तक पहुँची। SRF के अनुसार यह साँस और प्राण-शक्ति को शांत करती है, ताकि मन भीतर ईश्वर की ओर मुड़ सके। इसे सिखाने के लिए वे समुद्र पार गए। विधि स्वयं केवल YSS और SRF की पाठमाला और दीक्षा से सिखाई जाती है, किताबों या वेबसाइटों से नहीं।
आत्म-साक्षात्कार
योगानन्द के लिए जीवन का उद्देश्य ईश्वर को केवल मानना नहीं, सीधे जानना है। YSS उनके शब्द उद्धृत करती है: "आत्म-साक्षात्कार का अर्थ है शरीर, मन और आत्मा में यह जानना कि हम ईश्वर की सर्वव्यापकता से एक हैं।" यह एकता बाहर से पाई जाने वाली चीज़ नहीं। यह पहले से सच है, और ध्यान उसे उघाड़ देता है।
सच्चे धर्मों की एकता
योगानन्द सिखाते थे कि गीता में कृष्ण और सुसमाचारों में ईसा के मूल उपदेश एक ही सत्य की ओर इशारा करते हैं। उन्होंने दोनों पर टीकाएँ लिखीं, गीता पर गॉड टॉक्स विद अर्जुन भी। उनके अनुसार यह सत्य बहस से सिद्ध नहीं होता, ध्यान में अनुभव होता है।
संतुलित जीवन
योगानन्द ने शरीर, मन और आत्मा, तीनों की साथ-साथ देखभाल सिखाई। YSS उनकी सलाह को यूँ बताती है: सही आहार, व्यायाम, सकारात्मक सोच और रोज़ का ध्यान। राँची का उनका विद्यालय इसी विचार पर बना था, जहाँ योग और ध्यान सामान्य पढ़ाई के साथ चलते थे।
गुरु-शिष्य का बंधन
योगानन्द को क्रिया योग एक अटूट परंपरा से मिला: महावतार बाबाजी, लाहिड़ी महाशय, श्री युक्तेश्वर। वे सिखाते थे कि ईश्वरीय मार्गदर्शन ऐसे सिद्ध गुरुओं की परंपरा से बहता है। शिष्य का काम है गुरु की विधि का सच्चा, नियमित अभ्यास; तब सहायता आती है। श्री युक्तेश्वर के आश्रम में बिताए दस साल उनके हर उपदेश की नींव थे।
रोज़ के जीवन के लिए
- ध्यान का समय तय कीजिए। इस हफ़्ते सुबह और शाम एक ही समय पर बैठिए, चाहे 10–15 मिनट ही।
- दिन को कृतज्ञता से बाँधिए। दिन की शुरुआत और अंत एक छोटी, मौन धन्यवाद-प्रार्थना से कीजिए।
- शरीर का ध्यान रखिए। सादा भोजन, थोड़ा व्यायाम, पूरा आराम और सकारात्मक विचार।
- हर धर्म का आदर कीजिए। किसी दूसरी आस्था से मिलें, तो अंतर नहीं, नीचे का साझा सत्य खोजिए।
- काम को अर्पण बनाइए। चुपचाप दूसरों की सेवा कीजिए और रोज़ के काम को ईश्वर को अर्पण मानिए।
तीर्थ स्थान
- योगदा सत्संग शाखा मठ, राँची, झारखंड। उनका पहला आश्रम और विद्यालय; उनका कमरा और वह लीची का पेड़ जिसके नीचे वे पढ़ाते थे, आज भी सुरक्षित हैं।
- YSS दक्षिणेश्वर आश्रम, कोलकाता, पश्चिम बंगाल। गंगा किनारे योगदा सत्संग सोसायटी का मुख्यालय।
- गोरखपुर, उत्तर प्रदेश। उनकी जन्मभूमि।
- YSS नोएडा आश्रम, नोएडा, उत्तर प्रदेश। दिल्ली के पास YSS का बड़ा केंद्र।
- SRF लेक श्राइन, पैसिफ़िक पैलिसेड्स, अमेरिका। 1950 में उनके द्वारा समर्पित ध्यान-उद्यान, जहाँ गांधीजी की अस्थियों का अंश है।
- SRF हर्मिटेज, एनसिनिटास, अमेरिका। जहाँ योगी कथामृत का बड़ा हिस्सा लिखा गया।
आज की विरासत
योगानन्द की बनाई दोनों संस्थाएँ उनका काम आगे बढ़ा रही हैं। 1917 में स्थापित योगदा सत्संग सोसायटी ऑफ़ इंडिया का मुख्यालय कोलकाता के दक्षिणेश्वर में है, और राँची तथा नोएडा में इसके आश्रम हैं। 1920 में शुरू हुई सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप का केंद्र लॉस एंजेलिस का माउंट वॉशिंगटन मदर सेंटर है। दोनों संस्थाएँ, उनकी बनाई व्यवस्था के अनुसार, गृह-अध्ययन पाठमाला और दीक्षा से क्रिया योग सिखाती हैं। कैलिफ़ोर्निया में लोग आज भी लेक श्राइन के उद्यानों में घूमते हैं और एनसिनिटास हर्मिटेज जाते हैं।
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मार्ग पर चलें
योगानन्द की पहली सलाह सीधी थी: रोज़ ध्यान कीजिए। इस हफ़्ते सुबह और शाम एक तय समय चुनिए और दस-पंद्रह मिनट शांत बैठिए। दिन की शुरुआत और अंत मौन धन्यवाद से कीजिए। अगर आप क्रिया योग सीखना चाहें, तो योगदा सत्संग सोसायटी ऑफ़ इंडिया इसे अपनी पाठमाला से सिखाती है, जैसा उन्होंने चाहा था। चाहें तो राँची आश्रम जाइए, या सोने से पहले योगी कथामृत का एक अध्याय धीरे-धीरे पढ़िए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
परमहंस योगानन्द के गुरु कौन थे?
उनके गुरु स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि थे, जिनसे वे 1910 में 17 साल की उम्र में मिले और जिनके आश्रम में लगभग दस साल रहे। श्री युक्तेश्वर लाहिड़ी महाशय के शिष्य थे, और लाहिड़ी महाशय के गुरु महावतार बाबाजी थे। योगानन्द के माता-पिता भी लाहिड़ी महाशय के शिष्य थे।
क्रिया योग क्या है और इसे कैसे सीखें?
क्रिया योग ध्यान की एक प्राचीन विधि है, जो महावतार बाबाजी से चली आई है। यह साँस और प्राण-शक्ति को शांत करती है, ताकि मन भीतर ईश्वर की ओर मुड़ सके। योगानन्द की संस्थाएँ इसे केवल अपनी गृह-अध्ययन पाठमाला और दीक्षा से सिखाती हैं। भारत में शुरुआत योगदा सत्संग सोसायटी ऑफ़ इंडिया से कीजिए।
योगी कथामृत इतनी प्रसिद्ध क्यों है?
1946 में प्रकाशित यह पुस्तक योगानन्द की अपनी कहानी है: लाहिड़ी महाशय के प्रति उनके परिवार की भक्ति, श्री युक्तेश्वर के साथ बिताए वर्ष और भारत में जिन संतों से वे मिले। YSS इसे हिंदी में योगी कथामृत नाम से प्रकाशित करती है।
भारत में योगानन्द का आश्रम (राँची) कहाँ है?
योगदा सत्संग शाखा मठ झारखंड के राँची में है। यह उनका पहला आश्रम था और 1917 में शुरू हुए उनके विद्यालय का घर भी। उनका कमरा और वह लीची का पेड़ जिसके नीचे वे पढ़ाते थे, यहाँ सुरक्षित हैं। YSS का मुख्यालय कोलकाता के दक्षिणेश्वर में है, और नोएडा में भी बड़ा आश्रम है।
परमहंस योगानन्द ने देह कैसे छोड़ी?
7 मार्च 1952 को लॉस एंजेलिस के बिल्टमोर होटल में भारत के राजदूत डॉ. बिनय आर. सेन के सम्मान में हुए भोज में भाषण देने के ठीक बाद उन्होंने महासमाधि ली। उनका पार्थिव शरीर ग्लेनडेल के फ़ॉरेस्ट लॉन मेमोरियल-पार्क में रखा गया। वहाँ के निदेशक ने बाद में गवाही दी कि 20 दिन बाद भी कोई क्षय नहीं दिखा।
स्रोत
गुरुशक्ति द्वारा शोध और लेखन, अक्टूबर 2026।
