सन 1982 में कर्नाटक के शिमोगा में एक युवा शिक्षक ने दस दिन का मौन रखा। वे खोज रहे थे कि ध्यान की शांति और दिन भर के काम-काज के बीच पुल कैसे बने। बाद में उन्होंने बताया कि उसी मौन के दौरान सुदर्शन क्रिया "एक प्रेरणा की तरह" उनके भीतर उतरी। सांस का यही अभ्यास आज भी उनके काम के केंद्र में है।
ये शिक्षक हैं श्री श्री रवि शंकर, जिन्हें उनके अनुयायी प्यार से गुरुदेव कहते हैं, और जिन्होंने आर्ट ऑफ लिविंग की स्थापना की। वे जीवित गुरु हैं और बेंगलुरु के पास अपने आश्रम से सिखाते हैं। उनकी बात सीधी और व्यावहारिक है: हर भावना सांस में दिखती है; साधना को घर-दफ़्तर से अलग डिब्बे में बंद मत कीजिए; और सेवा इसलिए कीजिए कि किसी को उसकी ज़रूरत है, अपनी तसल्ली के लिए नहीं।
जीवन कथा
ध्यान में बैठा एक बालक
रवि शंकर का जन्म 1956 में दक्षिण भारत के तमिलनाडु में हुआ। आर्ट ऑफ लिविंग के अनुसार, चार साल की उम्र तक वे भगवद्गीता के अंश सुना लेते थे। वे अक्सर गहरे ध्यान में बैठे मिलते थे।
उनके पहले शिक्षक सुधाकर चतुर्वेदी थे, जो महात्मा गांधी के साथ काम कर चुके थे। उन्होंने बैंगलोर के एमईएस स्कूल में पढ़ाई की। 1973 में, सिर्फ़ 17 साल की उम्र में, उन्होंने भौतिकी और वैदिक साहित्य, दोनों में डिग्री पूरी कर ली।
आर्ट ऑफ लिविंग की शुरुआत
फाउंडेशन के अनुसार, उन्होंने 1981 में आर्ट ऑफ लिविंग की स्थापना की। संस्था अपने को एक अंतरराष्ट्रीय, गैर-लाभकारी शैक्षिक और मानवीय संगठन बताती है।
शिमोगा का दस दिन का मौन
अगले साल, 1982 में, वे शिमोगा में दस दिन के मौन में चले गए। उन्होंने देखा था कि बहुत से लोग ध्यान तो करते हैं, पर भीतर की शांति और बाहर का जीवन अलग-अलग चलते रहते हैं। वे इन दोनों को जोड़ने का रास्ता खोज रहे थे।
उनके अपने शब्दों में, उसी मौन के दौरान सुदर्शन क्रिया "एक प्रेरणा की तरह" आई। सुदर्शन क्रिया सांस का एक लयबद्ध अभ्यास है। यही आर्ट ऑफ लिविंग के कोर्सों की नींव बनी। संस्था इसे अपने हैप्पीनेस प्रोग्राम और ऑनलाइन ब्रेथ वर्कशॉप में सिखाती है। गुरुशक्ति इस विधि का वर्णन नहीं करता; जो इसे सीखना चाहें, वे आर्ट ऑफ लिविंग से ही संपर्क करें।
बेंगलुरु के पास आश्रम
1986 में बैंगलोर से लगभग 21 किलोमीटर दक्षिण, कर्नाटक के ग्रामीण इलाके में आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर की स्थापना हुई। यही उनका मुख्य केंद्र बना। यहाँ हर हफ़्ते आवासीय कोर्स चलते हैं। शाम को सत्संग होता है, जिसमें भजन गाए जाते हैं और ध्यान होता है। आने वाले लोग रसोई और परिसर के काम में सेवा भी करते हैं।
सेवा और शांति का काम
1997 में उन्होंने इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर ह्यूमन वैल्यूज़ (IAHV) की सह-स्थापना की। यह सहयोगी संस्था सेवा, संघर्ष-समाधान और मानवीय मूल्यों पर काम करती है। फाउंडेशन उन्हें इराक, आइवरी कोस्ट, कश्मीर और बिहार में विरोधी पक्षों को बातचीत तक लाने के प्रयासों का श्रेय देता है।
फाउंडेशन ने कोलंबिया की शांति प्रक्रिया में उनकी भूमिका का विस्तार से ब्योरा दिया है, जिसकी कहानी नीचे दी गई है।
सम्मान
2016 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। सूची में उनका नाम "अन्य-अध्यात्म" श्रेणी में, कर्नाटक से दर्ज है। वे आज भी बेंगलुरु के पास अपने आश्रम से सिखाते हैं।
मुख्य उपदेश
सांस में छिपी हैं भावनाएँ
गुरुदेव सिखाते हैं कि सांस और मन गहराई से जुड़े हैं। आर्ट ऑफ लिविंग के अनुसार उनका कहना है: "हर भावना के लिए सांस में एक अलग लय होती है।" जैसे भावनाएँ सांस को बदलती हैं, वैसे ही सांस की लय बदलकर मन और व्यवहार के ढर्रे बदले जा सकते हैं। यही सुदर्शन क्रिया का मूल विचार है। यह अभ्यास संस्था के कोर्सों में सिखाया जाता है।
भीतर का मौन, बाहर का जीवन
बहुत से लोग साधना को दिन के एक कोने में रख देते हैं। 1982 में शिमोगा के मौन में वे यही खोज रहे थे कि भीतर की शांति और बाहर के काम के बीच पुल कैसे बने। उनकी सीख में ध्यान और सांस काम, परिवार और सेवा के लिए मन को स्थिर करते हैं।
सेवा हमारा स्वभाव है
22 अगस्त 2013 को बैंगलोर आश्रम में दिए एक प्रवचन में गुरुदेव ने सेवा पर बात की। उन्होंने सिर्फ़ मज़े के लिए या अपने को अच्छा महसूस कराने के लिए सेवा करने से सावधान किया। उनके शब्दों में: "अगर आप केवल आनंद के लिए सेवा करते हैं, तो आप स्वार्थी हो रहे हैं।" सच्ची सेवा यह देखकर होती है कि किसी को मदद चाहिए।
हिंसा-मुक्त दुनिया
गुरुदेव खुलकर अपने "पागल-से विचार" की बात करते हैं: एक ऐसी दुनिया जिसमें हिंसा न हो। अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर वे कहते हैं कि उनका लक्ष्य है कि लोग अहिंसक, करुणामय और दूसरों के मददगार होने पर गर्व करें।
सीमाओं से परे मानवीय मूल्य
आर्ट ऑफ लिविंग और IAHV के ज़रिए गुरुदेव निजी साधना को समाज-सेवा से जोड़ते हैं। जो संस्थाएँ सांस और ध्यान सिखाती हैं, वही आपदा राहत, हाशिये पर रहने वाले लोगों की मदद और धर्मों के बीच सद्भाव का काम भी करती हैं।
रोज़ के जीवन के लिए
- अपनी सांस पर ध्यान दीजिए। इस हफ़्ते देखिए कि गुस्से, घबराहट या सुकून के समय आपकी सांस कैसे बदलती है।
- शांति को दिन में साथ रखिए। सुबह या शाम कुछ मिनट भीतर की स्थिरता के लिए रखिए, और उस शांति को किसी एक व्यस्त पल में ले जाने की कोशिश कीजिए।
- ज़रूरत देखकर सेवा कीजिए। इस हफ़्ते सेवा का एक काम कीजिए, बिना धन्यवाद या अच्छे एहसास की उम्मीद के।
- अहिंसा चुनिए। गुस्सा आए तो बोलने से पहले रुकिए। धैर्यवान और मददगार होने पर गर्व कीजिए।
- मौन में बैठिए। रोज़ थोड़ी देर बिना फ़ोन और बिना बातचीत के मौन रहिए।
- सही जगह से सीखिए। सुदर्शन क्रिया जैसा सांस का अभ्यास सीखना हो तो उसे सिखाने वाली संस्था से सीखिए, किसी वीडियो या सुनी-सुनाई बात से नहीं।
तीर्थ स्थान
- आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर, बेंगलुरु के पास, कर्नाटक। शहर से लगभग 21 किमी दक्षिण उनका मुख्य केंद्र। शाम के सत्संग में भजन और ध्यान में शामिल होइए, विशालाक्षी मंडप देखिए, कोई आवासीय कोर्स कीजिए, या रसोई और परिसर में सेवा कीजिए।
- शिमोगा (शिवमोग्गा), कर्नाटक। फाउंडेशन के अनुसार, 1982 में दस दिन के मौन के दौरान यहीं सुदर्शन क्रिया का जन्म हुआ। यहाँ कोई एक स्थल चिह्नित नहीं है।
आज की विरासत
गुरुदेव जीवित गुरु हैं और उनका काम रोज़ चल रहा है। फाउंडेशन के अनुसार 1981 में स्थापित आर्ट ऑफ लिविंग सुदर्शन क्रिया, ध्यान और योग पर आधारित कोर्स चलाता है। हैप्पीनेस प्रोग्राम और ऑनलाइन ब्रेथ वर्कशॉप आम तौर पर शुरुआत के रास्ते हैं। 1997 में उनकी सह-स्थापित IAHV उनके सेवा और संघर्ष-समाधान वाले काम को आगे बढ़ाती है।
बेंगलुरु के पास का आश्रम आज भी केंद्र है। उनके प्रवचन और उनकी पुस्तक Notes for the Journey Within फाउंडेशन प्रकाशित करता है। गुरुशक्ति का आर्ट ऑफ लिविंग से कोई संबंध नहीं है; उनके उपदेशों और कोर्सों के लिए कृपया फाउंडेशन के आधिकारिक माध्यम देखें।
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मार्ग पर चलें
गुरुदेव की सीख उस चीज़ से शुरू होती है जो सबके पास है: सांस। इस हफ़्ते बस उसे देखिए। जब चिढ़ या जल्दबाज़ी महसूस हो, तो ध्यान दीजिए कि सांस कैसे बदली है, और उसे अपने आप थमने दीजिए। रोज़ कुछ शांत मिनट रखिए, चाहे एक छोटी प्रार्थना के साथ या अपने प्रिय नाम के जप के साथ।
फिर सेवा का एक छोटा काम कीजिए, या किसी ज़रूरतमंद को दान दीजिए, बिना धन्यवाद की आशा के। किसी फल का वादा नहीं है। सुदर्शन क्रिया सीखनी हो तो सीधे आर्ट ऑफ लिविंग से संपर्क कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री श्री रवि शंकर कौन हैं?
श्री श्री रवि शंकर, जिन्हें अनुयायी गुरुदेव कहते हैं, 1956 में तमिलनाडु में जन्मे एक जीवित आध्यात्मिक गुरु हैं। फाउंडेशन के अनुसार उन्होंने 1981 में आर्ट ऑफ लिविंग की स्थापना की, और 1997 में IAHV की सह-स्थापना की।
सुदर्शन क्रिया क्या है?
सुदर्शन क्रिया सांस का एक लयबद्ध अभ्यास है, जो गुरुदेव के अनुसार 1982 में शिमोगा में दस दिन के मौन के दौरान उन्हें मिला। यह उनकी इस सीख पर टिका है कि हर भावना की सांस में अपनी लय होती है। आर्ट ऑफ लिविंग इसे हैप्पीनेस प्रोग्राम और ऑनलाइन वर्कशॉप में सिखाता है; इसे वहीं से सीखें।
आर्ट ऑफ लिविंग की स्थापना कब हुई?
फाउंडेशन के अनुसार श्री श्री रवि शंकर ने 1981 में आर्ट ऑफ लिविंग की स्थापना की। इसका मुख्य अभ्यास, सुदर्शन क्रिया, 1982 में शिमोगा में सामने आया। बेंगलुरु आश्रम 1986 में और IAHV 1997 में बना।
बेंगलुरु में आर्ट ऑफ लिविंग आश्रम कहाँ है?
आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर बेंगलुरु, कर्नाटक से लगभग 21 किलोमीटर दक्षिण में है और 1986 में स्थापित हुआ। यहाँ आवासीय कोर्स, शाम का सत्संग और सेवा के अवसर हैं। गुरुशक्ति का आश्रम से कोई संबंध नहीं है; जाने से पहले संस्था के आधिकारिक माध्यम देखें।
श्री श्री रवि शंकर सेवा के बारे में क्या सिखाते हैं?
वे सिखाते हैं कि सेवा हमारा स्वभाव है और इसे इसलिए करना चाहिए कि किसी को मदद की ज़रूरत है। 2013 में बैंगलोर आश्रम के एक प्रवचन में उन्होंने कहा कि केवल आनंद के लिए की गई सेवा एक तरह का स्वार्थ है, जो शिकायत की ओर ले जाती है।
स्रोत
गुरुशक्ति द्वारा शोध और लेखन, अक्टूबर 2026।
