दक्षिण मुंबई के खेतवाड़ी की एक तंग गली में एक आदमी बीड़ी की छोटी-सी दुकान चलाता था। दुकान के ऊपर एक छोटा कमरा था। भारत और विदेश से साधक सीढ़ियाँ चढ़कर वहाँ आते, और यह दुकानदार उनसे बात करता कि वे असल में कौन हैं। दीवार पर संतों की तस्वीरों के बीच शिवाजी की भी एक तस्वीर टँगी थी। वे हँसकर कहते थे कि बेटा चाहता था कि यह यहाँ रहे, क्योंकि उनकी बीड़ियों का ब्रांड चित्र शिवाजी ही थे।
यही थे श्री निसर्गदत्त महाराज। उन्होंने गृहस्थ जीवन कभी नहीं छोड़ा, कोई आश्रम नहीं बनाया, कोई किताब नहीं लिखी। फिर भी 1973 में छपी उनकी वार्ताओं की किताब आई एम दैट ने दुनिया भर के साधकों को उस छोटे कमरे तक पहुँचा दिया। उनकी सीख हर नौकरीपेशा और परिवार वाले इंसान की पहुँच में है: शांत बैठो, "मैं हूँ" के सीधे एहसास को देखो, और खुद को शरीर और मन समझने की भूल छोड़ दो।
जीवन कथा
महाराष्ट्र के खेतों में बचपन
उनका जन्म 17 अप्रैल 1897 को हुआ और नाम रखा गया मारुति शिवरामपंत कांबली। माता-पिता धार्मिक स्वभाव के थे। बचपन ग्रामीण महाराष्ट्र में परिवार के खेत पर बीता। स्कूली पढ़ाई बहुत कम हुई। पर पिता के मित्र-मंडल में होने वाली आध्यात्मिक बातें वे ध्यान से सुनते और मन में उतारते रहे।
जवानी में वे काम की तलाश में बंबई आ गए। शुरुआत एक क्लर्क के रूप में हुई। फिर उन्होंने बीड़ी बेचने की छोटी दुकानें खोलीं और धीरे-धीरे कई दुकानें खड़ी कर लीं। 1920 के दशक में उनका विवाह सुमतिबाई से हुआ। दंपति के चार बच्चे हुए।
गुरु के पास तीन बार
1933 के आख़िर में एक मित्र उन्हें श्री सिद्धरामेश्वर महाराज के पास ले गया। सिद्धरामेश्वर महाराज नवनाथ संप्रदाय की इंचगिरी शाखा के गुरु थे। भक्त बताते हैं कि तीसरी मुलाक़ात में गुरु ने उन्हें मंत्र दिया और कहा कि तुम ही परम सत्य हो।
गुरु ने उन्हें एक ही निर्देश दिया: "मैं हूँ" के सीधे एहसास को पकड़े रहो। उन्होंने न बहस की, न सबूत माँगा। बस गुरु की बात पर भरोसा किया और अभ्यास में लग गए। बरसों बाद यही सरल निर्देश उनकी अपनी शिक्षा का केंद्र बना। गुरु ने उनसे रोज़ भजन गाते रहने को भी कहा था, और यह नियम उन्होंने जीवन भर निभाया।
भ्रमण और घर वापसी
1936 में सिद्धरामेश्वर महाराज ने देह त्याग किया। 1937–1938 में वे घर छोड़कर एक भ्रमणशील संन्यासी की तरह निकल पड़े। लगभग आठ महीने वे इसी तरह घूमते रहे।
फिर वे लौट आए। बंबई लौटे, परिवार में लौटे, पर अब भीतर से आत्मज्ञान में स्थिर होकर। इसके बाद वे गृहस्थ ही रहे। दुकान चलाई, परिवार सँभाला। उन्होंने साधु का वेश या मठ का जीवन नहीं अपनाया।
दुख और पहले शिष्य
1940 का दशक दुख लेकर आया। पहले पत्नी चली गईं, बाद में एक बेटी भी। उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया। डेविड गॉडमैन याद करते हैं कि पत्नी के बारे में उन्होंने कहा था: "जिस दिन वह गई, मैंने मुक्ति से विवाह कर लिया।"
1951 से वे अपने गुरु की परंपरा में शिष्यों को दीक्षा देने लगे। अगले पंद्रह बरस वे यह काम दुकान चलाते हुए करते रहे। 1966 में उन्होंने कारोबार से अवकाश ले लिया। इसके बाद वे दिन में दो बार वार्ता करते और ऊपर के छोटे कमरे में रोज़ भजन होते।
आई एम दैट और अंतिम वर्ष
मॉरिस फ्रिडमैन ने उनकी बहुत-सी वार्ताएँ दर्ज कीं, और 1973 में उनका यह रिकॉर्ड आई एम दैट नाम से छपा। इस किताब के बाद दुनिया भर से साधक खेतवाड़ी की उस गली तक आने लगे। भारतीय और पश्चिमी लोग दुकान के ऊपर वाले कमरे की सीढ़ियाँ चढ़ते। इन्हीं में मॉरिस फ्रिडमैन, रमेश बालसेकर और जीन डन भी थे।
अंत तक वे उसी छोटे कमरे में सिखाते रहे। 8 सितंबर 1981 को 84 वर्ष की आयु में श्री निसर्गदत्त महाराज ने मुंबई में देह त्याग किया। वालकेश्वर के पवित्र सरोवर बाणगंगा पर उनका अंतिम संस्कार हुआ।
मुख्य उपदेश
"मैं हूँ" का एहसास
यह वही निर्देश था जो उन्हें अपने गुरु से मिला, और आगे चलकर यही उनकी शिक्षा का केंद्र बना। "मैं यह हूँ" या "मैं वह हूँ" सोचने से पहले, बस होने का एक सरल एहसास होता है। यह हर किसी के पास है। महाराज कहते थे कि उस सीधे "मैं हूँ" पर टिके रहो और उसमें कुछ मत जोड़ो। न कोई नाम, न कोई कहानी, न कोई भूमिका।
पहचान की भूल
महाराज के अनुसार सारे दुख की जड़ एक भूल है। हम खुद को शरीर और मन मान लेते हैं। शरीर जन्म लेता है और मरता है, मन बेचैन रहता है, इसलिए हम मान बैठते हैं कि हम भी जन्मे हैं, बेचैन हैं और मरेंगे। उनका कहना था कि हमारा असली स्वरूप जागरूकता है, जो न जन्मती है, न मरती है।
सुनो, विचारो, ध्यान करो
उनके लिए समझ केवल शब्दों का खेल नहीं थी। पहले सत्य को सुनो। फिर उस पर तब तक विचार करो जब तक शंकाएँ न मिट जाएँ। फिर ध्यान करो, जब तक वह पक्का विश्वास न बन जाए। टिमोथी कॉनवे उनके इस आग्रह को दर्ज करते हैं: "तुम्हें ध्यान करना ही होगा!"
ज्ञान के साथ भक्ति
महाराज शुद्ध अद्वैत सिखाते थे, यानी यह कि सत्य एक ही है। फिर भी वे जीवन भर दिन में कई बार भजन गाते रहे, क्योंकि गुरु ने ऐसा कहा था। वे सिखाते थे कि आत्मा को किसी कर्मकांड की ज़रूरत नहीं। फिर भी गुरु के प्रति निष्ठा के कारण उन्होंने यह नियम कभी नहीं छोड़ा। उनके लिए ज्ञान और भक्ति एक-दूसरे के विरोधी नहीं थे।
संसार में पूरे मन से जियो
उन्होंने दुकान चलाई, परिवार पाला, और दुकान के ऊपर के कमरे से ज्ञान बाँटा। उन्होंने किसी से घर छोड़ने को नहीं कहा। उनकी दृष्टि में कर्तव्य पूरे मन से निभाने चाहिए, और साथ ही आत्मज्ञान में टिके रहना चाहिए। उनका जीवन दिखाता है कि गृहस्थ भी यह सीख जी सकता है।
रोज़ के जीवन के लिए
- "मैं हूँ" में टिकें। रोज़ कुछ मिनट चुपचाप बैठें और बस "मैं हूँ" के एहसास के साथ रहें। उसमें अपना पद, अपनी चिंताएँ मत जोड़ें।
- पूछें कि परेशान कौन है। इस हफ़्ते जब गुस्सा या चिंता उठे, रुककर पूछें कि परेशान कौन है। देखें कि जागरूकता खुद अछूती है।
- कर्तव्य पूरे मन से निभाएँ। अपने काम और परिवार को पूरा ध्यान दें। आध्यात्मिक जीवन के लिए घर छोड़ना ज़रूरी नहीं।
- एक भक्ति का नियम रखें। आत्म-विचार के साथ रोज़ एक भजन गाएँ या अपने गुरु से एक प्रार्थना करें।
- एक निर्देश पर टिकें। जिस सच्ची सीख पर भरोसा हो, उसे लगातार अभ्यास में लाएँ। बहुत-सी विधियाँ इकट्ठी करने से बचें।
- सिर्फ़ पढ़ें नहीं, ध्यान भी करें। जो पढ़ा या सुना, उसे रोज़ थोड़ा शांत समय दें, जब तक वह आपका अपना न हो जाए।
तीर्थ स्थान
- खेतवाड़ी, मुंबई, महाराष्ट्र। वह गली और इमारत जहाँ वे रहे, दुकान चलाई और ऊपर के कमरे में सिखाया। भक्त आज भी यहाँ आते हैं।
- बाणगंगा, वालकेश्वर, मुंबई, महाराष्ट्र। पवित्र सरोवर का वह इलाक़ा जहाँ 1981 में उनका अंतिम संस्कार हुआ। भक्त यहाँ उन्हें याद करने आते हैं।
- इंचगिरी, कर्नाटक। उनके गुरु की परंपरा के आचार्यों से जुड़ा गाँव, जिसके नाम पर इंचगिरी शाखा कहलाती है।
आज की विरासत
श्री निसर्गदत्त महाराज ने न कोई संस्था छोड़ी, न कोई बड़ा आश्रम। उनकी विरासत मुख्य रूप से किताबों और लोगों में जीवित है। सबसे जानी-मानी किताब है आई एम दैट, जो 1973 में मॉरिस फ्रिडमैन के रिकॉर्ड के रूप में छपी। जीन डन और रमेश बालसेकर ने भी उनकी वार्ताओं के संग्रह तैयार किए।
अपने गुरु श्री सिद्धरामेश्वर महाराज के ज़रिए वे नवनाथ संप्रदाय की इंचगिरी शाखा से जुड़े हैं, और 1951 से उन्होंने इसी परंपरा में शिष्यों को दीक्षा दी। भारत और विदेश के साधक आज भी उनकी वार्ताएँ पढ़ते हैं और उनके उस एक सरल निर्देश का अभ्यास करते हैं। भक्त अब भी खेतवाड़ी की उस गली में आते हैं जहाँ वे रहे और सिखाते रहे।
चित्र

यह चित्र जनरेटिव एआई से सुधारा, बड़ा किया या फिर से बनाया गया हो सकता है।
मार्ग पर चलें
उनकी सीख के लिए किसी सामान की ज़रूरत नहीं। इस हफ़्ते हर सुबह पाँच शांत मिनट निकालें। बैठें, साँस को थमने दें, और कोई भी पहचान ओढ़ने से पहले "मैं हूँ" के सीधे एहसास को देखें। मन भटके तो धीरे से लौट आएँ।
शाम को, जैसे वे करते थे, भक्ति का एक छोटा-सा नियम रखें: एक भजन, एक प्रार्थना, या धीमे स्वर में भगवान का नाम। चाहें तो परिवार के लिए सेवा (निःस्वार्थ काम) का कोई छोटा काम भी जोड़ लें। कुछ होना ज़रूरी नहीं। बस अभ्यास करें, और करते रहें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
निसर्गदत्त महाराज कौन थे और उनके गुरु कौन थे?
श्री निसर्गदत्त महाराज (1897–1981) अद्वैत के गुरु थे, जो मुंबई में गृहस्थ की तरह रहे और बीड़ी की दुकान चलाते थे। उनके गुरु नवनाथ संप्रदाय की इंचगिरी शाखा के श्री सिद्धरामेश्वर महाराज (1888–1936) थे, जिन्होंने 1933 में उन्हें दीक्षा दी।
"आई एम दैट" का क्या अर्थ है?
आई एम दैट (मैं वही हूँ) मॉरिस फ्रिडमैन द्वारा दर्ज उनकी वार्ताओं की किताब है, जो 1973 में छपी। यह नाम उनकी मूल सीख की ओर इशारा करता है: हर "मैं यह हूँ" के नीचे "मैं हूँ" का सरल एहसास है, और हमारा असली स्वरूप शरीर या मन नहीं, अजन्मी जागरूकता है।
निसर्गदत्त महाराज ने "मैं हूँ" के एहसास के बारे में क्या सिखाया?
वे साधकों से कहते थे कि "मैं यह हूँ" या "मैं वह हूँ" सोचने से पहले वाले, होने के सरल एहसास पर टिके रहो। यही निर्देश उन्हें अपने गुरु से मिला था। इसे लगातार पकड़े रहने से इंसान खुद को शरीर और मन समझने की भूल से बाहर आता है।
क्या निसर्गदत्त महाराज ने कोई किताब लिखी?
नहीं, उन्होंने स्वयं कुछ नहीं लिखा। भक्तों ने उनकी वार्ताएँ दर्ज कीं। सबसे प्रसिद्ध है मॉरिस फ्रिडमैन द्वारा संपादित आई एम दैट (1973)। जीन डन और रमेश बालसेकर ने भी उनकी वार्ताओं के संग्रह संपादित किए।
निसर्गदत्त महाराज मुंबई में कहाँ रहते और सिखाते थे?
वे दक्षिण मुंबई के खेतवाड़ी में रहते थे। वहीं उनकी बीड़ी की दुकान थी, और उसके ऊपर के छोटे कमरे में वार्ताएँ और भजन होते थे। 1966 में कारोबार छोड़ने के बाद वे उसी कमरे में दिन में दो बार वार्ता करते थे। भक्त आज भी उस गली में आते हैं।
स्रोत
गुरुशक्ति द्वारा शोध और लेखन, अक्टूबर 2026।
