लगभग 1858 में चाँद पाटिल के परिवार की एक बारात शिर्डी गाँव पहुँची। उसके साथ एक युवा साधु भी आए, जिन्हें कुछ साल पहले गाँव वालों ने एक नीम के पेड़ के नीचे बैठे देखा था। गाँव के भक्त म्हालसापति ने उनका स्वागत दो शब्दों से किया: "या साईं"। यही नाम उनके साथ जुड़ गया, और गाँव उन्हें साईं बाबा कहने लगा।
वे कहाँ जन्मे, किसके घर और किस धर्म में, यह कोई नहीं जानता। शिर्डी उन्हें उसी रूप में जानता था जैसे वे सामने थे। वे एक टूटी-फूटी मस्जिद में रहते, भिक्षा माँगकर खाते, दूसरों के लिए खाना पकाते, और एक धूनी जलाए रखते जिसकी राख वे बाँट देते। लोगों से वे बस दो चीज़ें माँगते थे: श्रद्धा और सबुरी, यानी विश्वास और धीरज।
जीवन कथा
नीम के नीचे एक युवक
श्री साईंबाबा संस्थान द्वारा सहेजी गई भक्त परंपरा के अनुसार वे पहली बार लगभग 1854 में शिर्डी में दिखे। तब वे करीब सोलह साल के युवक थे और एक नीम के पेड़ के नीचे बैठे रहते थे। वह जगह आज गुरुस्थान कहलाती है। वे अपने गुरु की बात करते थे, और भक्त मानते हैं कि गुरुस्थान में उन्हीं गुरु की समाधि है।
उनकी जन्मतिथि, जन्मस्थान, असली नाम, परिवार और जन्म का धर्म, कुछ भी दर्ज नहीं है। कभी-कभी जो वर्ष 1838 बताया जाता है, वह बाद का अनुमान है, जो उनकी दिखती उम्र से पीछे गिनकर लगाया गया।
"या साईं"
लगभग 1857 में वे कुछ समय के लिए शिर्डी छोड़कर चले गए। करीब एक साल बाद वे चाँद पाटिल के परिवार की बारात के साथ लौटे। म्हालसापति ने उन्हें "या साईं" कहकर पुकारा, और इसी से उनका नाम साईं बाबा पड़ा।
वे एक टूटी हुई मस्जिद में बस गए, जिसे उन्होंने द्वारकामाई नाम दिया। वहाँ उन्होंने धूनी जलाई, एक पवित्र अग्नि जो हमेशा जलती रहती। इस धूनी की राख, जिसे ऊदी कहते हैं, वे आने वालों को देते। वे गाँव में भिक्षा माँगते, ख़ुद खाना पकाते और दूसरों को परोसते।
द्वारकामाई, चावड़ी और आरती
बरसों में उनके आसपास भक्तों का एक घेरा बन गया। इनमें म्हालसापति, माधवराव देशपांडे (जिन्हें शामा कहते थे), तात्या कोते पाटिल और अब्दुल बाबा थे। बाद में हेमाडपंत आए, यानी गो. र. दाभोलकर, और उपासनी महाराज भी।
1909 से वे एक-एक रात छोड़कर शिर्डी की चावड़ी में सोने लगे। 10 दिसंबर 1909 से उनकी आरती नियमित रूप से होने लगी। 1912 में गुरुस्थान पर पादुकाएँ स्थापित हुईं और द्वारकामाई की मरम्मत का काम पूरा हुआ।
बूटी का वाड़ा और समाधि
1915 में भक्त गोपालराव बूटी ने शिर्डी में एक वाड़ा, यानी बड़ी हवेली, बनवाना शुरू किया। आगे चलकर यही समाधि मंदिर बना।
15 अक्टूबर 1918 को, विजयादशमी के दिन, साईं बाबा ने देह छोड़ी। उनकी देह बूटी के वाड़े में समाधिस्थ की गई, और वही भवन उनका मंदिर बन गया।
1918 के बाद
1920 के दशक की शुरुआत में अदालत की मंज़ूरी से श्री साईंबाबा संस्थान बना। संस्थान की अपनी वेबसाइट 1921 बताती है, कुछ दूसरे स्रोत 1922। हेमाडपंत का मराठी श्री साईं सच्चरित्र उनके जीवन और सीख का मुख्य ग्रंथ बना। 7 अक्टूबर 1954 को समाधि मंदिर में साईं बाबा की सफ़ेद संगमरमर की मूर्ति स्थापित हुई, जिसके दर्शन भक्त आज करते हैं।
मुख्य उपदेश
श्रद्धा और सबुरी
साईं बाबा से सबसे गहराई से जुड़ी सीख है श्रद्धा और सबुरी। श्री साईं सच्चरित्र में ये वे दो सिक्के हैं जो हर साधक को अर्पित करने होते हैं। श्रद्धा का अर्थ है, रास्ता साफ़ न दिखे तब भी गुरु और भगवान पर भरोसा रखना। सबुरी का अर्थ है, जवाब के लिए ज़बरदस्ती किए बिना धीरज से इंतज़ार करना। यह सीख उन्होंने राधाबाई देशमुख के प्रसंग में दी, जो आगे दिया गया है।
सबका एक मालिक
संस्थान का इतिहास उनकी यह सीख दर्ज करता है कि सबके ऊपर एक ही मालिक है। इसी भाव से वे सिखाते थे कि राम और रहीम एक हैं। वे जिस मस्जिद में रहे, उसे उन्होंने द्वारकामाई कहा और वहाँ धूनी जलाए रखी। साधक के लिए सीख यह है कि अलग-अलग नामों के पीछे एक ही भगवान को देखें।
खिलाओ और बाँटो
श्री साईं सच्चरित्र के अनुसार वे अपने हाथों से खाना पकाते और द्वारकामाई आने वालों को परोसते थे। वे भक्तों से भूखों को खाना खिलाने को कहते थे। जो व्यक्ति ख़ुद भिक्षा माँगकर खाता हो, उसके लिए यह छोटी बात नहीं थी। जो कुछ उनके पास होता, वे बाँट देते। उनकी सीख में दूसरों को खिलाना भगवान की सेवा का सीधा रास्ता था।
गुरु के प्रति समर्पण
श्री साईं सच्चरित्र बार-बार एक बात पर लौटता है: गुरु पर पूरा भरोसा रखो और अहंकार छोड़ दो। यहाँ समर्पण का अर्थ सोचना छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ है उस "मैं" को किनारे रखना जो हर बात अपने ढंग से चाहता है। जिसने श्रद्धा और सबुरी अर्पित कर दी, वह गुरु की छाया में चैन से रह सकता है।
सादा जीवन
संस्थान के अनुसार वे एक मस्जिद में रहे, गाँव में भिक्षा माँगी और उनके पास लगभग कुछ नहीं था। उनकी ज़रूरतें बहुत कम थीं। यह सादगी अपने आप में एक सीख थी। इसने भक्तों को दिखाया कि आध्यात्मिक जीवन के लिए धन या दिखावे की ज़रूरत नहीं, और जो हम बाँटते हैं वह उससे बड़ा है जो हम रखते हैं।
रोज़ के जीवन के लिए
- रोज़ एक बार धीरज। हर दिन किसी एक मुश्किल हालात को सबुरी से सँभालिए: रुकिए, साँस लीजिए, और नतीजे के लिए ज़ोर मत लगाइए।
- खाना बाँटिए। इस हफ़्ते किसी ऐसे को खिलाइए जो बदले में कुछ न लौटा सके: कोई मज़दूर, कोई अजनबी, कोई भूखा जानवर।
- अनेक नाम, एक भगवान। हर धर्म के बारे में आदर से बोलिए, और ध्यान दीजिए जब मन ऐसा न करना चाहे।
- सादा नियम रखिए। घर पर रोज़ एक ही समय छोटी-सी प्रार्थना या आरती काफ़ी है।
- नतीजा छोड़ दीजिए। अपना काम पूरे मन से कीजिए, फिर नतीजा भगवान पर छोड़िए, जैसे भक्त गुरु पर भरोसा करता है।
- थोड़ा हल्का जिएँ। कोई एक चीज़ जिसकी अब ज़रूरत नहीं, किसी को दे दीजिए।
तीर्थ स्थान
- समाधि मंदिर, शिर्डी, महाराष्ट्र। उनकी समाधि और 1954 में स्थापित सफ़ेद संगमरमर की मूर्ति। यहाँ रोज़ चार आरतियाँ होती हैं।
- द्वारकामाई, शिर्डी, महाराष्ट्र। वह मस्जिद जहाँ वे रहे। धूनी आज भी जलती है।
- चावड़ी, शिर्डी, महाराष्ट्र। जहाँ वे 1909 से एक-एक रात छोड़कर सोते थे। गुरुवार को यहाँ पालकी निकलती है।
- गुरुस्थान, शिर्डी, महाराष्ट्र। वह नीम का पेड़ जहाँ वे पहली बार दिखे, और 1912 में स्थापित पादुकाएँ।
- लेंडी बाग़, शिर्डी, महाराष्ट्र। वह बाग़ जहाँ नीम और पीपल के बीच नंदा दीप जलता है।
आज की विरासत
शिर्डी आज एक ऐसा तीर्थ नगर है जो एक व्यक्ति के सादे जीवन के इर्द-गिर्द बसा है। 1920 के दशक की शुरुआत में बना श्री साईंबाबा संस्थान ट्रस्ट समाधि मंदिर की देखरेख करता है। 1909 में शुरू हुई आरती की परंपरा आज रोज़ चार आरतियों के रूप में चलती है, और गुरुवार की पालकी भी। 2018 में उनकी समाधि के सौ साल पूरे होने पर दशहरे के मौक़े पर लाखों भक्त शिर्डी पहुँचे।
श्री साईं सच्चरित्र, जिसे संस्थान अपनी ई-लाइब्रेरी में उपलब्ध कराता है, भक्तों का मुख्य ग्रंथ है। हिंदू और मुसलमान, दोनों उन्हें श्रद्धा से मानते हैं। उन्हें पुट्टपर्थी के सत्य साईं बाबा (1926–2011) से नहीं मिलाना चाहिए, जो अलग संत थे।
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मार्ग पर चलें
साईं बाबा ने बड़े अनुष्ठान नहीं, श्रद्धा और सबुरी माँगी। इस हफ़्ते आप रोज़ शाम घर में एक छोटा दीया जलाकर कुछ मिनट उसके पास बैठ सकते हैं, एक छोटी प्रार्थना या आरती के साथ। कोई एक हालात चुनिए जहाँ आप आमतौर पर जल्दबाज़ी करते हैं, और वहाँ सबुरी का अभ्यास कीजिए। किसी भूखे के लिए खाना बनाइए या ख़रीदिए, जैसे वे द्वारकामाई में करते थे। इन छोटे कामों को अपनी गति से आदत बनने दीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
साईं बाबा हिंदू थे या मुसलमान?
उनका जन्म, परिवार और जन्म का धर्म दर्ज नहीं है। वे एक मस्जिद में रहे जिसे उन्होंने द्वारकामाई नाम दिया, वहाँ धूनी जलाए रखी, और सिखाया कि राम और रहीम एक हैं। उनके जीवनकाल में भी और आज भी हिंदू और मुसलमान, दोनों उन्हें मानते हैं। गुरुशक्ति उन्हें भक्ति परंपरा के संत के रूप में नमन करता है।
श्रद्धा सबुरी का क्या अर्थ है?
श्रद्धा का अर्थ है विश्वास और सबुरी का अर्थ है धीरज। श्री साईं सच्चरित्र में ये वे दो सिक्के हैं जो हर साधक को अर्पित करने होते हैं। यह सीख साईं बाबा ने राधाबाई देशमुख को दी, जिन्होंने मंत्र पाने के लिए उपवास किया था। उन्होंने बताया कि श्रद्धा और सबुरी किसी भी मंत्र से बढ़कर हैं।
शिर्डी साईं बाबा ने समाधि कब ली?
उन्होंने 15 अक्टूबर 1918 को, विजयादशमी के दिन, महाराष्ट्र के शिर्डी में महासमाधि ली। उनकी देह उस वाड़े में समाधिस्थ की गई जिसे भक्त गोपालराव बूटी ने 1915 में बनवाना शुरू किया था। वही भवन आज श्री साईं बाबा समाधि मंदिर है।
ऊदी क्या है और शिर्डी में यह क्यों दी जाती है?
ऊदी उस धूनी की पवित्र राख है जिसे साईं बाबा द्वारकामाई में हमेशा जलाए रखते थे। वे यह राख आने वालों को देते थे, और धूनी आज भी वहाँ जलती है। भक्त ऊदी को उनके प्रसाद और उनकी उपस्थिति की याद के रूप में लेते हैं। यह श्रद्धा का प्रतीक है, किसी इलाज का वादा नहीं।
श्री साईं सच्चरित्र क्या है?
यह साईं बाबा के जीवन और उपदेशों का मुख्य ग्रंथ है, जिसे उनके भक्त हेमाडपंत, यानी गो. र. दाभोलकर ने मराठी में लिखा। इसमें राधाबाई देशमुख के उपवास और श्रद्धा-सबुरी की सीख जैसे प्रसंग दर्ज हैं। श्री साईंबाबा संस्थान ट्रस्ट इसे अपनी ऑनलाइन ई-लाइब्रेरी में उपलब्ध कराता है।
स्रोत
गुरुशक्ति द्वारा शोध और लेखन, अक्टूबर 2026।
