लगभग 1290 में नेवासा में एक किशोर, जिसकी उम्र परंपरा के अनुसार लगभग पंद्रह साल थी, एक ग्रंथ बोलकर लिखवा रहा था। यह भगवद्गीता की टीका थी, पर विद्वानों की भाषा संस्कृत में नहीं। वह गीता को मराठी में उतार रहा था, ताकि आम लोग उसे अपने शब्दों में समझ सकें। परंपरा आज भी नेवासा का वह खंभा दिखाती है, जिसके पास बैठकर उसने यह ग्रंथ लिखवाया बताया जाता है।
उस लंबे ग्रंथ के बिल्कुल अंत में युवा लेखक ने ईश्वर से कुछ माँगा, पर अपने लिए कुछ नहीं। उसने प्रार्थना की: "जे खळांची व्यंकटी सांडो", यानी दुष्टों का टेढ़ापन छूट जाए। उसने दुष्टों के नाश की कामना नहीं की। यही प्रार्थना पसायदान है। संत ज्ञानेश्वर परंपरा के अनुसार केवल लगभग 21 वर्ष जिए, और अपने पीछे जीवन को देखने का एक ऐसा ढंग छोड़ गए जिसमें शत्रु भी प्रार्थना का पात्र है।
जीवन कथा
संन्यासी के बच्चे
ज्ञानेश्वर की कहानी उनके पिता विट्ठलपंत से शुरू होती है। विट्ठलपंत ने संन्यास ले लिया था, पर अपने गुरु के कहने पर वे फिर गृहस्थ जीवन में लौट आए। इस कारण कट्टर ब्राह्मणों ने परिवार का बहिष्कार कर दिया। जो बच्चे हुए, उन्हें "संन्यासी के बच्चे" कहा गया, और वे स्वीकृति के घेरे से बाहर पले।
ज्ञानेश्वर, जिन्हें ज्ञानदेव भी कहते हैं, का जन्म परंपरा के अनुसार 1275 में हुआ। वारकरी परंपरा उनका जन्मस्थान पैठण के पास आपेगाँव बताती है; ब्रिटैनिका आळंदी बताती है। वे चार भाई-बहनों में दूसरे थे: निवृत्ति, ज्ञानेश्वर, सोपान और मुक्ताबाई।
बच्चे छोटे ही थे कि माता-पिता चल बसे। अनाथ बच्चे स्वीकृति के लिए पैठण के ब्राह्मणों के पास गए और शुद्धि-पत्र माँगा। यह कथा आज किसी समुदाय पर दोष डाले बिना सुनाई जाती है।
भाई जो गुरु बने
ज्ञानेश्वर के गुरु उनके अपने बड़े भाई निवृत्तिनाथ थे। निवृत्ति ने उन्हें नाथ पंथ की दीक्षा दी। ज्ञानेश्वरी के अंत में ज्ञानेश्वर यह परंपरा गिनाते हैं: आदिनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ, गहिनीनाथ, और फिर निवृत्तिनाथ।
चारों भाई-बहन आगे चलकर वारकरी संतों के रूप में पूजे गए।
नेवासा में ज्ञानेश्वरी
लगभग 1290 में, शक संवत 1212 में, ज्ञानेश्वर ने आज के अहमदनगर ज़िले के नेवासा में अपना महान ग्रंथ पूरा किया। इसका असली नाम भावार्थदीपिका है, पर सब इसे ज्ञानेश्वरी कहते हैं। यह भगवद्गीता पर मराठी पद्य में टीका है, जो इसलिए लिखवाई गई कि आम लोग गीता पढ़ सकें। परंपरा कहती है कि तब उनकी उम्र लगभग पंद्रह साल थी।
इसके कुछ ही बाद उन्होंने अमृतानुभव लिखा, जो अद्वैत के अनुभव पर एक छोटा दार्शनिक ग्रंथ है।
नामदेव के साथ यात्रा
1290 के दशक में ज्ञानेश्वर की भेंट विट्ठल के एक और युवा भक्त नामदेव से हुई। दोनों साथ-साथ उत्तर भारत के तीर्थों की यात्रा पर गए। उनकी मित्रता और उनके भजनों से पंढरपुर के विट्ठल के इर्द-गिर्द वारकरी आंदोलन जागा, यानी उन तीर्थयात्रियों की परंपरा जो पैदल विट्ठल के मंदिर जाते हैं।
भक्त बताते हैं कि इन्हीं वर्षों में उनकी भेंट योगी चांगदेव से हुई, जो घमंड के साथ आए और विनम्र होकर लौटे। ज्ञानेश्वर ने उन्हें संबोधित करके 65 पदों की रचना की, चांगदेव पासष्टी।
आळंदी में समाधि
परंपरा के अनुसार 1296 में, कार्तिक वद्य एकादशी को, ज्ञानेश्वर ने इंद्रायणी के किनारे आळंदी में संजीवन समाधि ली। संजीवन समाधि का अर्थ है जीवित रहते हुए ली गई समाधि। तब उनकी उम्र लगभग 21 वर्ष थी।
वारकरी मानते हैं कि वे आज भी वहाँ ध्यान में हैं। आळंदी में उनकी समाधि सिद्धेश्वर मंदिर परिसर में, अजानवृक्ष के पास है। हर जून में उनकी पालकी, चाँदी की पादुकाओं के साथ, आषाढ़ी वारी के लिए आळंदी से पंढरपुर निकलती है।
मुख्य उपदेश
लोगों की भाषा में ज्ञान
भगवद्गीता को ज़्यादातर लोग संस्कृत के विद्वानों के ज़रिए ही सुन पाते थे। ज्ञानेश्वर ने उसे मराठी में उतार दिया, ताकि केवल विद्वान नहीं, हर कोई उसे समझ सके। इसका संदेश था कि आध्यात्मिक ज्ञान हर उस व्यक्ति का है जो उसे चाहता है, उसी भाषा में जिसमें वह सोचता है।
भक्ति और ज्ञान एक हैं
ज्ञानेश्वर की सीख में दिल और दिमाग़ के बीच कोई झगड़ा नहीं। विट्ठल की भक्ति और अद्वैत आत्मा का ज्ञान, दोनों एक ही लक्ष्य तक ले जाते हैं। उन्होंने दार्शनिक अमृतानुभव भी लिखा और भक्ति-भरा हरिपाठ भी, और दोनों में कोई विरोध नहीं देखा। नाम गाने वाला भक्त और आत्मा को खोजने वाला साधक, एक ही रास्ते पर दो ओर से चल रहे हैं।
सबका भला, दुष्टों का भी
पसायदान पूरे संसार के लिए प्रार्थना के साथ ज्ञानेश्वरी को पूरा करता है। वे ईश्वर से दुष्टों को नष्ट करने को नहीं कहते। वे कहते हैं: "जे खळांची व्यंकटी सांडो", दुष्टों का टेढ़ापन छूट जाए। और फिर: "भूतां परस्परें पडो । मैत्र जीवाचें", सभी जीवों में आपस में दिल की मैत्री हो। इस सीख में शत्रु कोई व्यक्ति नहीं, व्यक्ति के भीतर का टेढ़ापन है।
हर किसी का अपना धर्म
पसायदान में ज्ञानेश्वर प्रार्थना करते हैं कि संसार अपने स्वधर्म, यानी अपने कर्तव्य, के सूर्य के प्रकाश में देखे। हर व्यक्ति के लिए सही कर्म का अपना मार्ग है। अच्छे से निभाया गया कर्तव्य प्रकाश का मार्ग बन जाता है। दूसरे के काम से ईर्ष्या रास्ता धुँधला करती है।
सिद्धियों से ऊपर विनम्रता
भक्त बताते हैं कि योगी चांगदेव के पास बड़ी सिद्धियाँ थीं और बड़ा घमंड भी। युवा ज्ञानेश्वर से मिलकर उन्होंने सीखा कि प्रेम और सच्चे ज्ञान के आगे ऐसी शक्तियाँ कुछ नहीं। इस कथा की सीख यह है कि दूसरों को प्रभावित करने की इच्छा एक रुकावट है। विनम्रता वह दरवाज़ा खोलती है जिसे दिखावा बंद रखता है।
रोज़ के जीवन के लिए
- सबके भले की प्रार्थना करें। इस सप्ताह अपनी प्रार्थना में किसी ऐसे व्यक्ति को भी शामिल करें जिसने आपको चोट पहुँचाई हो, बस इतना माँगते हुए कि उसका टेढ़ापन कम हो।
- ज्ञान को सरल भाषा में बाँटें। जो सीखा है उसे समझाते समय वही शब्द चुनें जो सुनने वाला सचमुच बोलता है।
- अपना कर्तव्य अच्छे से करें। अपना एक काम चुनें और उसे ध्यान से करें, किसी और के काम से तुलना किए बिना।
- दिखावे को छोड़ें। प्रभावित करने की इच्छा पर ध्यान दें, और अपनी योग्यता दिखाने का एक मौक़ा चुपचाप जाने दें।
- सब जीवों को मित्र मानें। जिसे आप आम तौर पर अनदेखा करते हैं, उसका अभिवादन करें, या घर के पास किसी पशु या पौधे की देखभाल करें।
तीर्थ स्थान
- संत ज्ञानेश्वर समाधि मंदिर, आळंदी, पुणे ज़िला, महाराष्ट्र। उनकी समाधि, अजानवृक्ष और इंद्रायणी के घाट; कार्तिकी एकादशी पर यहाँ बड़े मेले लगते हैं।
- नेवासा, अहमदनगर ज़िला, महाराष्ट्र। पैस खांब नाम का वह खंभा, जिसके पास उन्होंने ज्ञानेश्वरी लिखवाई बताई जाती है।
- आपेगाँव, पैठण के पास, छत्रपति संभाजीनगर ज़िला, महाराष्ट्र। परंपरा के अनुसार उनका जन्मस्थान।
- त्र्यंबकेश्वर, नासिक ज़िला, महाराष्ट्र। उनके भाई और गुरु निवृत्तिनाथ की समाधि।
- चांगदेव मंदिर, जलगाँव ज़िला, महाराष्ट्र। योगी चांगदेव की कथा से जुड़ा स्थान।
- विट्ठल मंदिर, पंढरपुर, सोलापुर ज़िला, महाराष्ट्र। आषाढ़ी वारी में उनकी पालकी का गंतव्य।
आज की विरासत
ज्ञानेश्वर को वारकरी संप्रदाय के सह-संस्थापक के रूप में याद किया जाता है। हर जून उनकी पालकी, चाँदी की पादुकाओं के साथ, आषाढ़ी वारी के लिए आळंदी से पंढरपुर निकलती है। कार्तिकी एकादशी पर आळंदी में उनकी समाधि पर बड़े मेले लगते हैं।
ज्ञानेश्वरी मराठी पाठकों के लिए भगवद्गीता के द्वार खुले रखती है, और उसकी समापन-प्रार्थना पसायदान सब जीवों के लिए उनकी सद्भावना को आगे ले जाती है। उनके हरिपाठ और अमृतानुभव भी आज तक बचे हैं। उनके भाई-बहन निवृत्तिनाथ, सोपानदेव और मुक्ताबाई भी संतों के रूप में पूजे जाते हैं। भक्त उन्हें प्यार से "माऊली" भी कहते हैं।
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मार्ग पर चलें
ज्ञानेश्वर का उपहार सबके लिए एक प्रार्थना था। इस सप्ताह रोज़ कुछ शांत मिनट निकालें और पसायदान की एक पंक्ति पढ़ें या बोलें, जैसे "सभी जीवों में आपस में मैत्री हो।" फिर किसी ऐसे व्यक्ति को मन में रखें जो आपको कठिन लगता है, और बस इतनी कामना करें कि उसका टेढ़ापन, और आपका भी, कम हो। चाहें तो जो सीखा है, उसकी एक बात किसी से सरल शब्दों में बाँटें। इससे ज़्यादा कुछ नहीं माँगा गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
संत ज्ञानेश्वर कौन थे?
संत ज्ञानेश्वर, जिन्हें ज्ञानदेव भी कहते हैं, मराठी संत-कवि थे जो परंपरा के अनुसार 1275 से 1296 तक जिए। बड़े भाई निवृत्तिनाथ से नाथ पंथ की दीक्षा लेकर उन्होंने ज्ञानेश्वरी लिखी, जो भगवद्गीता पर मराठी टीका है, और नामदेव के साथ वारकरी आंदोलन की नींव रखी। उन्होंने आळंदी में समाधि ली।
पसायदान क्या है और इसका अर्थ क्या है?
पसायदान वह प्रार्थना है जिससे ज्ञानेश्वरी पूरी होती है। इसमें ज्ञानेश्वर अपने लिए कुछ नहीं माँगते। वे प्रार्थना करते हैं कि दुष्टों का टेढ़ापन छूट जाए, सब जीवों में मैत्री हो, पाप का अँधेरा दूर हो, और हर प्राणी को वह मिले जिसकी उसे चाह है।
ज्ञानेश्वर ने ज्ञानेश्वरी किस उम्र में लिखी?
परंपरा के अनुसार उन्होंने लगभग 1290 (शक 1212) में नेवासा में ज्ञानेश्वरी पूरी की, जब उनकी उम्र लगभग पंद्रह साल थी। उन्होंने इसे भगवद्गीता पर मराठी पद्य-टीका के रूप में लिखवाया, ताकि केवल संस्कृत के विद्वान नहीं, आम लोग भी गीता की सीख समझ सकें।
आळंदी की संजीवन समाधि क्या है?
संजीवन समाधि वह समाधि है जो जीवित रहते हुए ली जाती है। परंपरा मानती है कि 1296 में कार्तिक वद्य एकादशी को ज्ञानेश्वर लगभग 21 वर्ष की आयु में इंद्रायणी किनारे आळंदी में एक कक्ष में बैठकर समाधि में चले गए। वारकरी मानते हैं कि वे आज भी वहाँ ध्यान में हैं।
ज्ञानेश्वर के भाई-बहन कौन थे?
वे विट्ठलपंत की चार संतानों में दूसरे थे। बड़े भाई निवृत्तिनाथ उनके गुरु भी थे; छोटे भाई सोपानदेव थे और बहन मुक्ताबाई। चारों वारकरी संतों के रूप में पूजे जाते हैं। निवृत्तिनाथ की समाधि नासिक ज़िले के त्र्यंबकेश्वर में है।
स्रोत
- Jnanadeva — Encyclopaedia Britannica
- Alandi — Eco-Heritage, CPR Environmental Education Centre (MoEFCC)
- Changdev temple — Department of Tourism, Maharashtra
- Jnaneshvara — Encyclopedia of Hinduism (Jones & Ryan, 2007), via en-academic
- Pasayadan, full Marathi text (Bhavarthadipika ch. 18)
- The Procession of Saint Dnyaneshwar — Ananda
गुरुशक्ति द्वारा शोध और लेखन, अक्टूबर 2026।
