जुलाई 1896 के बीच के दिन थे। मदुरै में अपने चाचा के घर की ऊपरी मंज़िल के एक कमरे में 16 साल का एक स्कूली लड़का अकेला बैठा था। अचानक मृत्यु के गहरे डर ने उसे घेर लिया। वह लाश की तरह लेट गया, साँस रोक ली और खुद से पूछा: आखिर मरता क्या है? उसने देखा कि शरीर मर जाएगा, पर "मैं" बचा रहता है। उस दिन के बाद मृत्यु का डर फिर कभी नहीं लौटा।
यह लड़का था वेंकटरमण, जिसे दुनिया बाद में भगवान श्री रमण महर्षि के नाम से जानने लगी। उन्होंने कोई नया कर्मकांड नहीं दिया, बस एक सवाल दिया: "मैं कौन हूँ?" शोर से थके आज के साधक के लिए रमण का सीधा रास्ता और अरुणाचल पर बीता उनका जीवन दिखाता है कि शांति हालात पर निर्भर नहीं होती।
जीवन कथा
तिरुचुझी का बालक
वेंकटरमण का जन्म 29–30 दिसंबर 1879 की रात तमिलनाडु में मदुरै के पास तिरुचुझी में हुआ। वह आर्द्रा दर्शन की रात थी। उनकी माँ का नाम अलगम्मल था। उनका जन्म-घर आज सुंदरम मंदिरम कहलाता है। 1891 में वे डिंडीगुल गए और बाद में पढ़ाई के लिए मदुरै आ गए।
नवंबर 1895 में एक बुज़ुर्ग रिश्तेदार ने बातों-बातों में "अरुणाचल" का नाम लिया। यह नाम सुनते ही किशोर वेंकटरमण के भीतर कुछ हिल गया। अरुणाचल तिरुवन्नामलाई का वह पवित्र पर्वत है, जिसे स्वयं शिव माना जाता है।
मदुरै में मृत्यु का अनुभव
अगले साल जुलाई में मदुरै में वह अनुभव हुआ जिसका ज़िक्र ऊपर है। तब वे 16 साल के थे। जिस घर में यह हुआ, वह आज रमण मंदिरम कहलाता है।
कुछ ही हफ़्तों बाद, अगस्त 1896 के आख़िर में, वे किसी को बताए बिना घर से निकल पड़े। 29 अगस्त से 1 सितंबर के बीच वे तिरुवन्नामलाई पहुँचे। इसके बाद उन्होंने अरुणाचल को कभी नहीं छोड़ा।
पर्वत पर मौन के वर्ष
शुरू के वर्ष गहरी समाधि में बीते। वे अरुणाचलेश्वर मंदिर के भीतर ज़मीन के नीचे बने पाताल लिंगम में बैठे रहे, फिर गुरुमूर्तम नाम की जगह पर। फरवरी 1899 से वे पर्वत पर ही रहने लगे, ज़्यादातर विरूपाक्ष गुफा में, जहाँ लगभग 17 साल बिताए।
साधक अपने प्रश्न लेकर आते, और लगभग 1900 से 1902 के बीच रमण ने उनके उत्तर लिखकर दिए। इन भक्तों में से एक, एम. शिवप्रकाशम पिल्लै, ने ये प्रश्न-उत्तर दर्ज किए, जो छोटी-सी पुस्तक मैं कौन हूँ? (नान यार?) बनी। 18 नवंबर 1907 को काव्यकंठ गणपति मुनि ने घोषणा की कि इस मौन युवा स्वामी को भगवान श्री रमण महर्षि कहा जाए।
स्कंदाश्रम में माँ और बेटा
उनकी माँ एक बार पहले अरुणाचल आई थीं और बेटे से घर लौटने की विनती की थी। रमण बोले नहीं। उन्होंने एक पर्ची पर लिखा कि जो होना है, वह होकर रहेगा, और सबसे अच्छा है चुप रहना। माँ लौट गईं। 1916 में वे फिर आईं, इस बार साथ रहने के लिए, जब रमण पहाड़ी पर बने स्कंदाश्रम में चले गए। 19 मई 1922 को समाधि लेने तक वे वहीं बेटे के पास रहीं। उनकी समाधि पर बना मातृभूतेश्वर मंदिर ही वह केंद्र बना, जिसके चारों ओर पर्वत की तलहटी में आज का श्री रमणाश्रमम बसा।
अंतिम वर्ष
आश्रम के दरवाज़े कभी बंद नहीं होते थे, रात में भी नहीं। साधक पुराने हॉल (ओल्ड हॉल) में उनके पास आकर बैठते। उनका ज़्यादातर उपदेश प्रश्नोत्तर के रूप में था, जिसे भक्त लिख लेते थे। लेखक पॉल ब्रंटन उनसे मिलने आए और उनकी किताबों ने पश्चिम के पाठकों तक रमण का नाम पहुँचाया। 1 सितंबर 1946 को भक्तों ने उनके अरुणाचल आगमन की स्वर्ण जयंती मनाई।
1949 में उनकी बाईं बाँह में सार्कोमा हुआ। उन्होंने शरीर को लेकर कोई चिंता नहीं की। 14 अप्रैल 1950 को रात 8:47 बजे श्री रमणाश्रमम में उन्होंने देह त्याग दी।
मुख्य उपदेश
आत्म विचार: "मैं कौन हूँ?"
रमण की मुख्य साधना है आत्म विचार। हर विचार किसी "मैं" को आता है। विचार के पीछे भागने के बजाय मुड़कर पूछिए: यह किसे आया? मुझे। तो मैं कौन हूँ? मैं कौन हूँ? में वे समझाते हैं कि इस प्रश्न को थामे रहने से बाकी विचार शांत हो जाते हैं और मन अपने स्रोत में लौट जाता है। यह शब्दों वाला उत्तर नहीं, ध्यान को भीतर मोड़ने का तरीका है।
"मैं" का विचार ही जड़ है
मैं कौन हूँ? (प्रश्न 9) में वे बताते हैं कि मन असल में "मैं" का वह भाव है जो शरीर के साथ उठता है। यही पहला विचार है। बाकी सारे विचार इसके पीछे आते हैं, जैसे एक जड़ से अनेक शाखाएँ। इसलिए विचारों से एक-एक कर लड़ने के बजाय उस "मैं" का स्रोत खोजिए। जड़ मिली तो बाकी विचार अपने आप छूट जाते हैं।
सुख हमारा स्वभाव है
हम मानते हैं कि सुख चीज़ों में है। पर गहरी नींद में हमारे पास कुछ नहीं होता, फिर भी उसमें सुख होता है, क्योंकि तब मन शांत रहता है। मैं कौन हूँ? (प्रश्न 24) में वे लिखते हैं, "सुख आत्मा का स्वभाव ही है।" जब मन ठहरता है, वही सुख अपने आप प्रकट होता है।
समर्पण भी आत्म विचार जितना ही
हर किसी को आत्म विचार सहज नहीं लगता। मैं कौन हूँ? (प्रश्न 18) में वे बताते हैं कि खुद को पूरी तरह ईश्वर को सौंप देना, आत्मा के सिवा किसी विचार के लिए जगह न छोड़ना, उसी मंज़िल तक ले जाता है। उनके लिए भक्ति और विचार एक-दूसरे के विरोधी नहीं थे। उन्होंने खुद अरुणाचल के स्तोत्र रचे।
मौन और स्वीकार
माँ को लिखा उनका उत्तर उनके रवैये को बता देता है। जो होना है, वह होगा। इसलिए समझदारी इसी में है कि मौन और शांत रहा जाए। यह आलस्य नहीं है। बाद में उन्होंने माँ को अपने पास रहने के लिए अपनाया भी। पर जो आया, उससे उन्होंने संघर्ष नहीं किया, अपनी अंतिम बीमारी में भी नहीं।
रोज़ के जीवन के लिए
- "किसे?" पूछिए। इस हफ़्ते जब कोई चिंता उठे, चुपचाप पूछिए "यह किसे हो रही है?" और "मैं हूँ" के सरल बोध पर लौट आइए।
- मौन में बैठिए। रोज़ कुछ मिनट बस होने में बिताइए, कुछ हासिल करने की कोशिश के बिना।
- सुख भीतर खोजिए। गहरी नींद और शांत पलों की शांति को पहचानिए।
- काम कीजिए, फल सौंपिए। अपने कर्तव्य पूरे मन से निभाइए, फिर परिणाम ईश्वर को सौंप दीजिए।
- दरवाज़ा खुला रखिए। पशुओं और अपने पास आने वाले हर व्यक्ति के प्रति दयालु रहिए, जैसे उनके आश्रम के दरवाज़े रात में भी बंद नहीं होते थे।
- जो है, उसे होने दीजिए। जो बदला नहीं जा सकता, उसके आगे मौन और शांत रहिए।
तीर्थ स्थान
- श्री रमणाश्रमम, तिरुवन्नामलाई, तमिलनाडु। उस पुराने हॉल में बैठिए जहाँ वे साधकों से मिलते थे, और उनकी समाधि तथा माँ की समाधि पर बने मातृभूतेश्वर मंदिर के दर्शन कीजिए।
- विरूपाक्ष गुफा, अरुणाचल पर्वत, तिरुवन्नामलाई, तमिलनाडु। वह गुफा जहाँ वे लगभग 17 साल रहे।
- स्कंदाश्रम, अरुणाचल पर्वत, तिरुवन्नामलाई, तमिलनाडु। 1916 से 1922 तक उनका घर, जहाँ माँ उनके साथ रहीं।
- पाताल लिंगम, अरुणाचलेश्वर मंदिर, तिरुवन्नामलाई, तमिलनाडु। ज़मीन के नीचे का वह तहख़ाना जहाँ वे पहली बार गहरी समाधि में बैठे।
- सुंदरम मंदिरम, तिरुचुझी, तमिलनाडु। उनका जन्म-घर।
- रमण मंदिरम, मदुरै, तमिलनाडु। वह घर जहाँ मृत्यु का अनुभव हुआ।
आज की विरासत
श्री रमणाश्रमम आज भी तिरुवन्नामलाई में अरुणाचल की तलहटी में, उनकी समाधि और माँ के मातृभूतेश्वर मंदिर के चारों ओर बसा है। पुराना हॉल मौन में बैठने वालों के लिए खुला है। उनका उपदेश उनकी अपनी छोटी रचनाओं के ज़रिये आगे चलता है। एम. शिवप्रकाशम पिल्लै की दर्ज की हुई मैं कौन हूँ? आश्रम से प्रकाशित होती है। उपदेश सारम, उल्लदु नार्पदु और अरुणाचल के स्तोत्र भक्त पढ़ते और गाते हैं। आज "मैं कौन हूँ?" का प्रश्न ऐसे साधक भी साधते हैं, जो उनसे कभी नहीं मिले।
चित्र

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मार्ग पर चलें
इस हफ़्ते कोई शांत समय चुनिए, शायद सुबह-सवेरे या सोने से पहले। पाँच-दस मिनट आराम से बैठिए। कोई विचार आए तो उसके पीछे मत जाइए। धीरे से पूछिए, "यह किसे आया?" और "मैं हूँ" के सादे बोध में टिक जाइए। अगर आत्म विचार कठिन लगे, तो बस अपना दिन ईश्वर को सौंप दीजिए; रमण ने कहा कि यह भी उसी जगह ले जाता है। उनके आश्रम की भावना में किसी पशु को भोजन दीजिए, या द्वार पर आए किसी व्यक्ति का स्वागत कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रमण महर्षि का "मैं कौन हूँ?" आत्म विचार क्या है और इसका अभ्यास कैसे करें?
कोई विचार उठे तो पूछिए, "यह किसे आया?" उत्तर होगा, "मुझे।" फिर पूछिए, "मैं कौन हूँ?" और "मैं" के भाव पर टिके रहिए। मैं कौन हूँ? में वे समझाते हैं कि इससे बाकी विचार शांत होते हैं और मन अपने स्रोत में लौटता है।
रमण महर्षि के गुरु कौन थे?
रमण महर्षि का कोई मानव गुरु नहीं था। वे तिरुवन्नामलाई के पवित्र अरुणाचल पर्वत को, जिसे शिव माना जाता है, अपना गुरु मानते थे। 1896 में तिरुवन्नामलाई पहुँचने के बाद उन्होंने जीवन भर अरुणाचल नहीं छोड़ा।
रमण महर्षि के मृत्यु-अनुभव में क्या हुआ था?
जुलाई 1896 के बीच, 16 साल की उम्र में, मदुरै में चाचा के घर पर उन्हें अचानक मृत्यु का डर हुआ। वे लाश की तरह स्थिर लेट गए, साँस रोकी और पूछा कि मरता क्या है। उन्होंने जाना कि आत्मा को मृत्यु नहीं छूती, और कुछ हफ़्तों बाद वे अरुणाचल चले गए।
तिरुवन्नामलाई में रमण आश्रम कैसे जाएँ?
श्री रमणाश्रमम तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई में अरुणाचल पर्वत की तलहटी में है। यहाँ पुराना हॉल, उनकी समाधि तथा माँ के मातृभूतेश्वर मंदिर हैं। ऊपर पर्वत पर विरूपाक्ष गुफा और स्कंदाश्रम हैं। ताज़ा जानकारी आश्रम की वेबसाइट पर है।
रमण महर्षि ने देह कब त्यागी और उनकी समाधि कहाँ है?
रमण महर्षि ने 14 अप्रैल 1950 को रात 8:47 बजे तिरुवन्नामलाई के श्री रमणाश्रमम में देह त्यागी। उनकी समाधि अरुणाचल की तलहटी में आश्रम के भीतर ही है। पास में उनकी माँ अलगम्मल की समाधि पर बना मातृभूतेश्वर मंदिर है, जिनका देहांत 1922 में हुआ था।
स्रोत
गुरुशक्ति द्वारा शोध और लेखन, अक्टूबर 2026।
